15. मुक्त-ग़ज़ल : आँखों को मेरा अक्स..............


आँखों को मेरा अक्स इस कदर खटक गया II  
आईना  खुद    खुद  पटाक से चटक गया II
दांतों से पकड़ रक्खा था लेकिन ज़हे नसीब ,
मुट्ठी से वक़्त रेत के जैसे सटक गया II  
ओलों  सा आस्मां  से टपक तो रहा था मैं ,
चमगादड़ों सा फिर खजूर पर लटक गया II  
तेरे लिए तो मीलों मील दौड़ा हिरन सा ,
अपने लिए मैं चार कदम चलके थक गया II  
मैं फ़र्जे रहनुमाई में गद्दार नहीं था ,
जो सबको सही राह दिखा खुद भटक गया II
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

मुक्त ग़ज़ल : 267 - तोप से बंदूक