कविता : कसाई का बकरा बनना चाहता हूँ


झुण्ड में बकरियों के 
नौजवान इक बक़रा  ,
गोपिकाओं में सचमुच 
कृष्ण सा दिखाई दे ;
जबकि भरे यौवन में 
तरसता अकेला हूँ  ;
किन्तु क़सम बक़रे की 
लोभ नहीं मैथुन का  ,
मेरी नज़र में तो बस 
उसका कसाई के घर  ,
काटने से पहले तक 
पुत्र सा पाला जाना है  ।
मरने से पहले उसको हर 
वो ख़ुशी मयस्सर है
जो कि गरीब इन्सां को 
ख्वाब में भी दुष्कर है  ।
दो जून की रोटी को 
दिन रात काम करता है  ,
फिर भी इतना मिलता है 
कि पेट नहीं भरता है  ;
और अगर मरता है 
तो खाली पेट मरता है  ।
बक़रा बेफ़िक्र  ,
भरे पेट कटा करता है  ;
अपने गोश्त से कितने 
पेट भरा करता है  ।
हम तो न पाल पाते हैं ;
और न पले  जाते हैं  ;
क्यों वयस्क ( बालिग )होते हैं 
बेरोज़गार दुनिया में  ?
सिर्फ़ पेट की चिंता में ही प्राण खोते हैं  ।
बक़रे नहीं मरा करते 
वे तो क़ुर्बान होते हैं  ;
जो क़ुर्बान होते हैं 
वे महान होते हैं  ।
मुझको बक़रा बनना है 
जन्म अगर हो अगला
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Gaurav Dixit said…
shandar rachna hai aapki
गौरव दीक्षित जी बहुत बहुत धन्यवाद ।
sk dubey said…
ohho............................................!!!!!!!!

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