Disclamer

All posts are covered under copyright law . Any one who wants to use the content should take permission the author before reproducing the post in full or part in blog medium or print medium by any other way.Indian Copyright Rules

Tuesday, January 29, 2013

कविता : कसाई का बकरा बनना चाहता हूँ


झुण्ड में बकरियों के 
नौजवान इक बक़रा  ,
गोपिकाओं में सचमुच 
कृष्ण सा दिखाई दे ;
जबकि भरे यौवन में 
तरसता अकेला हूँ  ;
किन्तु क़सम बक़रे की 
लोभ नहीं मैथुन का  ,
मेरी नज़र में तो बस 
उसका कसाई के घर  ,
काटने से पहले तक 
पुत्र सा पाला जाना है  ।
मरने से पहले उसको हर 
वो ख़ुशी मयस्सर है
जो कि गरीब इन्सां को 
ख्वाब में भी दुष्कर है  ।
दो जून की रोटी को 
दिन रात काम करता है  ,
फिर भी इतना मिलता है 
कि पेट नहीं भरता है  ;
और अगर मरता है 
तो खाली पेट मरता है  ।
बक़रा बेफ़िक्र  ,
भरे पेट कटा करता है  ;
अपने गोश्त से कितने 
पेट भरा करता है  ।
हम तो न पाल पाते हैं ;
और न पले  जाते हैं  ;
क्यों वयस्क ( बालिग )होते हैं 
बेरोज़गार दुनिया में  ?
सिर्फ़ पेट की चिंता में ही प्राण खोते हैं  ।
बक़रे नहीं मरा करते 
वे तो क़ुर्बान होते हैं  ;
जो क़ुर्बान होते हैं 
वे महान होते हैं  ।
मुझको बक़रा बनना है 
जन्म अगर हो अगला
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

5 comments:

Gaurav Dixit said...

shandar rachna hai aapki

Dr. Hiralal Prajapati said...

गौरव दीक्षित जी बहुत बहुत धन्यवाद ।

jugal singh said...

Dhanyavad!

डॉ. हीरालाल प्रजापति said...

स्वागत ! jugal singh जी !

sk dubey said...

ohho............................................!!!!!!!!