2. मुक्त-ग़ज़ल : पूछ काम कितना..............



  पूछ काम कितना और क्या न करना पड़ता है ॥

  फिर भी रूखी - सूखी से पेट भरना पड़ता है ॥

  फ़स्ल की कहीं कोई भी कमी नहीं लेकिन ,

  अब भी कुछ गरीबों को घास चरना पड़ता है ॥

  अपने हक़ की खातिर अब इस निजाम में अक्सर ,

  बात बात पर अनशन धरना धरना पड़ता है ॥

  कोई भी बुलंदी पे घर नहीं बना सकता ,

  चाँद पर पहुँचकर सबको उतरना पड़ता है ॥

  हद न पार करने की सीख के लिए शायद ,

  रावणों को ऋषि बन सीताएँ हरना पड़ता है ॥

  कृष्ण हो सुदामा हो गांधी हो या ओसामा ,

  जो भी जन्म लेता है उसको मरना पड़ता है ॥

  क्या करें खुशामद में अपने हब्शी आक़ा को ,

  नौकरों को गोरा अंग्रेज़ कहना पड़ता है ॥

  सिर्फ न हो मक़सद औरों को रिझाना ही ,

  तहजीब के लिए भी सजना सँवरना पड़ता है ॥

  दूसरे के खाने से भूख नहीं मिटती है ,

  अपना पेट भरने को खुद को चखना पड़ता है ॥

  है कई ख़ुदा का भी खौफ़ जो नहीं खाते ,

  रस्मन अपने आक़ा से उनको डरना पड़ता है ॥

     -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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