19. मुक्त-ग़ज़ल : मुझमें खूब बचा है................


मुझमें ख़ूब बचा है अब भी मुझको यार चुका मत समझो ॥
राख तले हूँ लाल धधकता इक अंगार बुझा मत समझो ॥
यूँ अंदाज़ – ए - जिस्म देखकर क्या अंदाज़ लगाते हो ,
थपको मुंह पर छींटे मारो हूँ बेहोश मरा मत समझो ॥
आस्मान से गिरकर बोलो कौन बचा है धरती पर ,
गर मैं फिर भी सही सलामत हूँ तो इसे करामत समझो ॥
हिन्दू को बस हिन्दू बोलो मत बामन मत शूद्र कहो ,
मुस्लिम मुसलमान को  मानो सुन्नी और शिया मत समझो ॥
पूजें तो खुश रहें न पूजें तो दे दें जो श्राप हमें ,
बुत हो या वो ग़ैर मुजस्सम उसको कोई ख़ुदा मत समझो ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Comments

Kirti Vardhan said…
मुझमें ख़ूब बचा है अब भी मुझको यार चुका मत समझो ॥
रख तले हूँ लाल धधकता इक अंगार बुझा मत समझो ॥

behtarin mitr..vahvah
आ. कीर्ति वर्धन जी आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !
gope mishra said…
यथार्थ बयाँ करती **इन्सानियती मजहब का***बधाई
Harsh Tripathi said…
NICE , VERY NICE ; SINCERE APPEAL

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