*मुक्त-मुक्तक : 7 - औरतों सा सख़्त..................


औरतों सा सख़्त ग़म में 
भी सुबुकने न दिया ॥
सर किसी क़ीमत पे मैंने 
अपना झुकने न दिया ॥
मुझको लँगड़ा कहने वालों के
 किये यूं बंद मुंह ,
मैंने मंजिल पर भी आकर 
खुद को रुकने न दिया ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


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