*मुक्त-मुक्तक : 5 - अब यास से.....................



अब यास से अपने है लबरेज़ दिल का आलम ॥
उम्मीद पर ही तो हम अब तक रहे थे कायम ॥
जब हर तरफ मनाही इनकार-ओ-हिक़ारत है ,
बतलाओ किस बिना पे ज़िंदा रहें भला हम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति



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