5. मुक्त-ग़ज़ल : इक हथकड़ी सा.................


इक हथकड़ी सा कांच का कंगन लगा मुझे II
आज़ादियों  का  तोहफ़ा  बंधन लगा मुझे II
इस तरह साफ़ हो रहे हैं पेड़ शहर से ,
दो गमले जहाँ पर दिखे गुलशन लगा मुझे II
तन्हाई दूर होगी ये आया था सोचकर ,
मेले में और भी अकेलापन लगा मुझे II
जब तक गरीब था कमाई में लगा रहा ,
बनकर अमीर सबसे बुरा धन लगा मुझे II
बच्चों के ऐसे तौर तरीक़े हैं आजकल ,
बचपन में एक ख़ास बूढापन लगा मुझे II
माँ की अलोनी रोटियों में भी जो स्वाद था ,
होटल का चटपटा भी न भोजन लगा मुझे II
पत्थर भी पिसा देखता भूखे की नज़र से ,
आटा  कभी लगा कभी बेसन लगा मुझे II

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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