मुक्त-ग़ज़ल : 4 - शराब पीना है ॥


  आज मैख़ाने न जाकर , शराब पीना है ॥
  बैठकर घर पे ही जी भर , शराब पीना है ॥ 
  दुनिया कहती है बुरा ही शराबनोशी को ,
  इसलिए छुप के सही पर , शराब पीना है ॥ 
  जौ की अंगूर की महुए की कच्ची या पक्की ,
  आज़माइश के लिए हर , शराब पीना है ॥ 
  गर सही है कि दवा ग़म की इक हो जाम बड़ा ,
  तब तो बोतल ही उठाकर , शराब पीना है ॥ 
  होश कुछ ऐसा उड़े लौट के न फिर आए ,
  इसलिए मुझको बराबर , शराब पीना है ॥
  शाम से रात तलक दौरे जाम क्यों न चले ,
  सुब्ह होते ही मुँह धोकर , शराब पीना है ॥
  लोग पी जाते हैं लेकर ख़ुदा का नाम ज़हर ,
  हमको अल्लाह-ओ-अक़बर , शराब पीना है ॥
  आपकी हो जो इजाज़त तो एक अर्ज़ करूँ ,
  आपके साथ बिरादर , शराब पीना है ॥
  क्यूँ पियाले को लगाते हो मुँह से लो चम्मच ,
  तुमको मानिंदे दवा गर , शराब पीना है ॥
  आज के बाद न होठों से फिर लगाऊँगा ,
  आज सिर पर ये क़सम धर , शराब पीना है ॥
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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