3. मुक्त-ग़ज़ल : तेरे होते निर्जन भी.....................


तेरे होते निर्जन भी कब निर्जन होता है ॥
सन्नाटों में भी भौरों सा गुंजन होता है ॥
तू न दिखे तो सच आँखें औचित्यहीन लगतीं ,
तू जो मिले तो मन मरुथल वृन्दावन होता है ॥
तेरे सँग ही अपना जी भर लंच – डिनर होता ,
बिन तेरे केवल पीना या अनशन होता है ॥
तू राँझे को हीर सरीखा कैस को लैला सा ,
मैं अंधे के हाथ में जैसे दर्पन होता है ॥
तू संतान नहीं मानव की कहीं से लगती है ,
तुझसी रचना का पितु अलखनिरंजन होता है ॥
छूना भी तुझको यथार्थ में दिवा-स्वप्न अपना ,
किन्तु स्वप्न में नित्यालिंगन चुंबन होता है ॥
यों खग जी सकता है बिन पंखों के पर कब तक ,
उड़ने वाले को चलना कब शोभन होता है ॥
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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