9. मुक्त-ग़ज़ल : हर वक़्त न बनकर.................


  हर वक़्त न बनकर राम रहो ।। 
मौका  मौका घनश्याम रहो ।।
पानी भी रहो शरबत भी रहो ,
कभी चाय कभी-कभी जाम रहो ।।
बरगद का गर्मी में  साया ,
सर्दी में अलाव या घाम रहो ।।
कभी खार-ए-बबूल-ओ-नागफणी ,
कभी गुल ;गुलशन ;गुलफाम रहो ।।
दहलीज़ पे मंदिर मस्जिद की  ,
ग़र ख़ास रहो पर आम रहो ।।
कोशिश न कभी अपनी छोड़ो ,
ग़र बाज़  दफ़ा नाकाम रहो ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Sanjeev Mishra said…
हर वक़्त न बनकर राम रहो।।
मौका मौका घनश्याम रहो।।
.........................बहुत सुन्दर...बहुत खूब.......लाजवाब..........:)
बहुत-बहुत धन्यवाद ! Sanjeev Mishra जी !

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