8. मुक्त-ग़ज़ल : जूलियट सी हीर सी................


जूलियट सी हीर सी लैला के जैसी प्रेमिका II
इस ज़माने में कहाँ पाओगे ऎसी प्रेमिका II
कसमें वादों पर यकीं यूँ ही नहीं करती कभी,
है चतुर, चालाक, ज्ञानी आजकल की प्रेमिका II   
बच नहीं सकता है अब आशिक़ बहाने से किसी
जिससे करती प्यार करती उससे शादी प्रेमिका II
बेवफ़ा आशिक़ को अब माफ़ी न देती दोस्तों ,
अब सबक सिखला के बदला खूब लेती प्रेमिका II
एक आशिक़ छोड़ दे तो ख़ुदकुशी करती नहीं ,
दूसरे से इश्क़ को तैयार रहती प्रेमिका II
पहले आशिक़ कि नज़र से देखती थी ये जहाँ,
अब तो चीलो-गिद्ध जैसी आँख रखती प्रेमिका II
इश्क़ में जिस्मों के रिश्तों को भी देती अहमियत,
अब न दकियानूस शर्मीली न छुई-मुई प्रेमिका II
अब तो मुंह बोले बहन भाई पे शक़ लाजिम हुआ,
कितने ही तफ्तीश में निकले हैं प्रेमी प्रेमिका II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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