6. मुक्त-ग़ज़ल : मुझको वो बच्ची..............


मुझको वो बच्ची लगती है ॥ 
सचमुच ही अच्छी लगती है ॥ 
खूब पकी है खूब मधुर है,
दिखने में कच्ची लगती ॥ 
 यों अंदाज़े बयाँ है उसका,
झूठी भी सच्ची लगती है ॥ 
 चलती है तो हिरनी भासे,
तैरे तो मच्छी लगती है ॥ 
 एक शेरनी है वह लेकिन,
गैया की बच्छी लगती है ॥ 
 हिंद महासागर सी ठहरी,
गंगा सी बहती लगती है ॥ 
 वाशिंगटन लन्दन दिमाग से,
दिल से नई-दिल्ली लगती है ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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