20. मुक्त-ग़ज़ल : नाखुश मैं अपने...................

नाखुश  मैं  अपने  आप  से रहता हूँ आजकल II
अच्छा हूँ खुद को पर बुरा कहता हूँ आजकल II
 कल  तक  मैं  सख्त  बर्फ  की सफ़ेद झील था ,
नीली नदी  की  धार सा  बहता  हूँ आजकल II
 तूफ़ान को पहले मैं  हिमालय   की  तरह था ,
अब  रेत  के  घरौंदों  सा  ढहता हूँ आजकल II
 चिढ़ता था तहे दिल से खुशामद से अपनी  मैं ,
सब गालियाँ भी प्यार से सहता हूँ आजकल II
 तासीर  मेरी  कैसे  यकायक  बदल  गयी  ?
हीरा हूँ  मगर काँच से कटता  हूँ आजकल  II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Anonymous said…
very nice gajal
Anonymous said…
shabd heer tatha kanch ka istemal bahut sunder hai.

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