13. मुक्त-ग़ज़ल : तलब में दोस्ती की.....................



तलब में दोस्ती की दुश्मनों में जा पहुँचे।।
चले थे मस्ज़िदों को मैकदों में जा पहुँचे।।
उड़ा के रख दिया सब कुछ शराब खोरी में ,
बड़े मकाँ से सड़े झोपड़ों में जा पहुँचे।।
ऐसा लगता था कि होटल में ठहरे सैलानी ,
'स्वर्ग 'लिक्खे हुए कितने घरों में जा पहुँचे।।
काम की चाल से कछुओं को लजाते अफ़सर ,
यूं ही सरकारी कई दफ्तरों में जा पहुँचे।।
 हमने सच पाए सब इल्ज़ाम  नीचता वाले ,
जब परखने के लिए कुछ बड़ों में जा पहुँचे।।
दूर रह के हुए जो वाकिआत आपस में ,
तलाक भूल फ़िर हम बिस्तरों में जा पहुँचे।।
मिला न काम हमें जब किसी महकमे में ,
तो नौकरी के लिए तस्करों में जा पहुँचे।।
    - डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Popular posts from this blog

विवाह अभिनंदन पत्र

विवाह आभार पत्र

कहानी : एक नास्तिक की तीर्थ यात्रा