12. मुक्त-ग़ज़ल : मत वही गुजरे जमाने......


मत वही गुज़रे ज़माने याद कर रोया करो ॥

दौर जो चालू है उसके साथ में दौड़ा करो ॥

अपने सीधे सादेपन को इक तरफ फेंको कहीं ,

होशियारी चालबाज़ी के हुनर सीखा करो ॥

सच के कहने से अगर पड़ते हों लाले जान के ,

फिर तो बखुदा बेतअम्मुल झूठ ही बोला करो ॥

दिल को दहला पिघला दें ऐसे न मंजर देखिए ,

आँख को दिलकश नज़ारों पे ही अब रोका करो ॥

दुश्मनों से आप खूँ का खेल खुलकर खेलिए ,

पीठ में यारों की खंजर मत मगर घोंपा करो ॥

इस ज़माने में बनावट और दिखावा खास है ,

काटना चाहे न लेकिन ज़ोर से भौंका करो ॥

रँग रहे हैं गाँव भी तेज़ी से शहरी रंग में ,

तुम भी धोती छोड़ दो फुलपेंट ही पहना करो ॥

लीक पर तो सब ही चलते हैं अगर तुम हो अलग ,

बंजरों में फिर गुलों की इक फसल पैदा करो ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

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