11. मुक्त-ग़ज़ल : किसी बात का कब......................


किसी बात का कब बुरा मानता हूँ  II
तुझे तो मैं अपना  खुदा मानता हूँ II
मेरी कामियाबी का क्या राज़ खोलूँ ,
इसे  तो  मैं  तेरी  दुआ मानता हूँ II
मेरा तू जो चाहे वो हँसकर उठाले ,
मेरा तो मैं सब कुछ तेरा मानता हूँ II
जो मैं चाहता हूँ वो सब कुछ है तुझमें ,
तुझे अपनी खातिर बना मानता हूँ II
नया कुछ नहीं है तेरा मेरा मिलना ,
ये जन्मों का मैं सिलसिला मानता हूँ II
भले दूर से दूर तुम हो वलेकिन ,
मैं कब खुद को तुझसे जुदा मानता हूँ II
मिलो न मिलो इसकी परवाह क्या अब ,
दिल-ओ-जाँ तुझे जब दिया मानता हूँ II
तेरी बेनियाज़ी को तेरी क़सम है ,
मैं परवाह की इंतिहा मानता हूँ II
[ वलेकिन=किन्तु  ;बेनियाज़ी=उपेक्षा ]
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

बहुत सुन्दर ग़ज़ल लिखी है आपने...!
हम भी प्रजापति ही हैं मान्यवर..!
धन्यवाद ! डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी !
आप भी प्रजापति हैं जानकर खुशी हुई........डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री जी !
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