10. मुक्त-ग़ज़ल : खूब ठहरा बस अब...................



 ख़ूब ठहरा बस अब तो चलने दो।। 
अपना अरमान मत कुचलने दो।।
मुझको शम्मा की आग दे ठंडक ,
हूँ  शरारा  ब - शौक़  जलने दो।।
सूखे पतझड़ में काट ले जाना ,
फ़स्ले गुल है अभी तो फलने दो।।
नर्म लफ्जों का खूब असर देखा ,
मुझको लहजा मेरा बदलने दो।।
लोग कमबख्त बदनसीब कहें ,
उसके लिक्खे को फ़िर से लिखने दो।।
भूल जायेंगे वो तलाक फ़लाक ,
एक कमरे से मत निकलने दो।।
मामला हक़ का पेशे ख़िदमत है ,
माँगने ,छीनने ,झपटने दो।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Comments

Ghanshyam kumar said…
बहुत सुन्दर...
धन्यवाद ! Ghanshyam kumar जी !

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