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दुनिया के हर कमाल का..........................

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दुनिया के हर कमाल का जमाल मुबारक़ ॥ पुरलुत्फ़,रक्स,धूम और धमाल मुबारक़ ॥ है आज सबके लब पे सिर्फ़ एक ही जुम्ला हो सबको नया साल बेमिसाल मुबारक़ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 433 - जानवर को बहुत...............

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  जानवर को बहुत प्यार करता जहाँ ॥   पेड़ पौधों पे भी दुनिया देती है जाँ ॥   दूरियाँ होशियारी से क़ायम रखे ,   इंसाँ इंसाँ से बचता फिरे याँ वहाँ ॥               -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक - ख़िदमत अदब की............

ख़िदमत अदब की हमने दूसरे ही ढंग की ॥ अफ़्साना लिक्खा कोई ना कभी ग़ज़ल कही ॥ बस जब किसी अदीब की शा’ए हुई किताब , लेकर न मुफ़्त बल्कि वो ख़रीदकर पढ़ी ॥ ( ख़िदमत=सेवा, अदब=साहित्य, अफ़्साना=उपन्यास,कहानी, अदीब=साहित्यकार, शा’ए=प्रकाशित ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति




*मुक्त-मुक्तक : 432 - रिश्ता हो कोई ठोंक...................

रिश्ता हो कोई ठोंक बजाकर बनाइये ॥
शादी तो लाख बार सोचकर रचाइये ॥
अंजाम कितने ही है निगाहों के सामने ,
झूठी क़शिश को इश्क़ो मोहब्बत न जानिये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 431 - बचपन में ही इश्क ने..............

बचपन में ही इश्क ने उसको यों जकड़ा ॥ है चौदह का मगर तीस से लगे बड़ा ॥ जिससे दोनों हाथ से लोटा तक न उठे , वो प्याले सा एक हाथ से उठाता घड़ा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 430 - सबपे पहले ही से................

सबपे पहले ही से बोझे थे बेशुमार यहाँ ॥ अश्क़ टपकाने लगते सब थे बेक़रार यहाँ ॥ सोचते थे कि होता अपना भी इक दिल ख़ुशकुन लेकिन ऐसा न मिला हमको ग़मगुसार यहाँ ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 429 - तक्लीफ़ो-ग़म-अलम से..................

तक्लीफ़ो-ग़म-अलम से ,
शादमानियों से क्या ? बेलौस-कामयाबियों ,
बरबादियों से क्या ? अब जब न तेरा मेरा 
कोई वास्ता रहा - मुझे तेरी तंदुरुस्ती औ
बीमारियों से क्या ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 428 - ज्यों आँखें मलते उठते हो................

ज्यों आँखें मलते उठते हो 
यों ही भीतर से जागो तुम ॥ मैं आईना हूँ अपने सच से 
मत बचकर के भागो तुम ॥ क़सीदे से कहीं उम्दा 
लगे ऐसी रफ़ू मारो , फटे दामन को कथरी की 
तरह मत हाय तागो तुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 427 - इतना अमीर था वो.............

इतना अमीर था वो 
ऐसा मालदार था , धन का कुबेर उसके आगे 
ख़ाकसार था ! ताउम्र फिर भी क्यों 
कमाई में लगा रहा , धेला भी जिसका ख़र्च 
बस कभी कभार था ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

क़ाबिल ही नहीं होते...............

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क़ाबिल ही नहीं होते ज़माने में कामयाब, नालायकों ने भी छुआ है आसमान को ॥
अंधों के हाथ भी तो बटेरें लगें यहाँ ,
पाते हैं कितने भुस की जगह जाफ़रान को ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 426 - तेरी पसंदगी को................

तेरी पसंदगी को सोचकर के कब कहे ? दिल के ख़याल फ़ौरन औ’’ ज्यों के त्यों सब कहे ॥ ख़ुद के सुकून ख़ुद की तसल्ली की गरज से , जितने भी अपनी ग़ज़लों में मैंने क़तब कहे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 425 - चाहता हूँ कि मेरे.................

चाहता हूँ कि मेरे दिल में तेरी मूरत हो ॥
तू किया करती मेरी रात दिन इबादत हो ॥ लैला मजनूँ से हीर राँझे टोला मारू से , अपनी दुनिया-ए-इश्क़ में ज़ियादा शोहरत हो ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 424 - चार कदम पर मंजिल हो तो........

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चार कदम पर मंजिल हो तो पहुँचें पैदल से ,
छोटी मोटी दूरी पार करें गर साइकल से , पर्यावरण रहेगा बेहतर सेहत चुस्त दुरुस्त , मिल जायेगी नजात किल्लते पेट्रोल डीजल से ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 423 - कई दिन के कुछ इक...................

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कई दिन के कुछ इक भूखे 
पड़े कुत्तों को बुलवाना , मुझे रख देना उनके सामने 
औ' तुम सब हट जाना , मेरी ख़्वाहिश है ठीक ऐसा ही 
करना मैं मरूँ जिस दिन , मेरे मुर्दे को मत मदफ़न में 
मेरे यारों दफ़नाना ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 422 - आँखें बारिश न बनें.................

आँखें बारिश न बनें 
क्यों ये मरुस्थल होएँ ?
जब मशीन हम नहीं तो 
दर्द में नक्यों रोएँ ?
जब कसक उठती है 
होती है घुटन सीने में ,
क्यों न अपनों से कहें 
ग़म अकेले चुप ढोएँ ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 421 - तुझे कब उरूज मेरा...................

तुझे कब उरूज मेरा 
बस जवाल चाहिए था ? मेरे चेहरे पे हमेशा 
इक मलाल चाहिए था ॥ तेरी रब ने सुनली तेरी 
मर्ज़ी के मुताबिक़ अब , मेरा हो गया है जीना 
जो मुहाल चाहिए था ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 420 - मूरत जो हुस्न की............

मूरत जो हुस्न की कोई पहला बनाएगा ॥
वो हू ब हू बस आपका पुतला बनाएगा ॥ काढ़ेगा सताइश के क़सीदों पे क़सीदे , रंग रुपहला तो रूप सुनहला बनाएगा ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

बुद्धि विधाता............

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बुद्धि विधाता बाह्य जगत को इतनी बुद्धि तो दो ॥  तन प्रक्षालन करे न करे आत्म शुद्धि तो दो ॥  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

तुझ जैसा नहीं और..............

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तुझ जैसा नहीं और किसी देवता का रूप ॥ तुझ जैसा नहीं और कोई देवता अनूप ॥ देता है ज़रूरत के मुताबिक हरेक को , तू गर्मियों में बर्फ ठंड में कड़कती धूप । -डॉ. हीरालाल प्रजापति

तुम मुझे चाहे मत..............

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तुम मुझे चाहे मत कभी मिलना , पर मुझे चाहना न तजना तुम ॥ तुम मेरा नाम किसी सूरत में , भूलना मत भले न भजना तुम ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 419 - कार सा जीवन था मेरा..................

कार सा जीवन था मेरा  बैल गाड़ी हो गया ॥
मुझसे खरगोशों से कछुआ 
भी अगाड़ी हो गया ॥
हर कोई आतुर है मुझसे 
जानने पर क्या कहूँ ?
बाँटने वाले से मैं 
कैसे कबाड़ी हो गया ?
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक :418 - कैसी रेलमपेल रे................

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कैसी रेलमपेल रे भैया कैसी रेलमपेल ॥
भीड़मभाड़ से दिखती खाली आज न कोई रेल ॥ हर हालत में अपनी मंजिल पाने के बदले , जिसको देखो उसको अपनी जाँ से खेले खेल ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गिरता भूमिगत जल..................

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गिरता भूमिगत जल का स्तर कर लो माप ॥
मोती मानुस चून न जल बिन उबरत बाप ॥
इसको व्यर्थ बहाना सचमुच पाप है पाप ,
कब पानी की कीमत को समझेंगे आप ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

सिर्फ़ इक बार अपनी..............

सिर्फ़ इक बार अपनी 
शक्ल वो दिखा जाता ॥  
तरसती - ढूंढती 
आँखों को चैन आ जाता ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

देख रहे हो ऐसा..............

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देख रहे हो ऐसा सचमुच कर जाऊंगा मैं ॥ मान जाओ हाँ करदो वरना मर जाऊंगा मैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति

किडनी लीवर तेरे............

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किडनी लीवर तेरे खराब हो न जाएँ कहीं ॥ इतनी मत पी शराब होश खो न जाएँ कहीं ॥ - डॉ. हीरालाल प्रजापति

कर्म दिवस-निशि और न कोई......

कर्म दिवस-निशि और न कोई दूजा करते हैं ॥ तेरी सुंदरता की प्रतिपल  पूजा करते हैं ॥ दृग मूँदे मन-चक्षु फाड़ कुछ स्वप्न-तले तेरे , धुर सन्यासी भी दर्शन का भूजा करते हैं ॥ (दृग=आँख ,मन-चक्षु=मन की आँख ,भूजा=भोग) -डॉ. हीरालाल प्रजापति





*मुक्त-मुक्तक : 417 - काँटा कोई नुकीला..............

काँटा कोई नुकीला लगे 
कब कली लगे ? सच कह रहा हूँ ज़िंदगी न 
अब भली लगे ॥ जब से हुआ है उससे 
हमेशा को बिछुड़ना , बारिश भी उसकी सिर क़सम 
अजब जली लगे ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 416 - बिन कुछ किए धरे भी................

बिन कुछ किए धरे भी वो 
हो जाएँ क़ामयाब ॥ हम लाख उठा-पटक करें 
न कुछ हो दस्तयाब ॥ हम दिल भी जलाएँ तो 
अंधेरा नहीं मिटता , वो जुल्फ़ सँवारें तो 
उग जाएँ आफ़्ताब ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 415 - कुछ बह्र की , कुछ जंगलों की.........

कुछ बह्र की , कुछ जंगलों की 
आग बने हैं ॥ कुछ शम्अ , कुछ मशाल , कुछ 
चराग़ बने हैं ॥ वो तो बनेगा सिर्फ़ किसी 
एक का मगर , उसके फ़िदाई लाखों 
लोग-बाग बने हैं ॥ -डॉ. हीरालाल प्रजापति