शीर्षक में क्या धरा है ?


       शीर्षक
 ! शीर्षक ! शीर्षक ! आख़िर क्या धरा है शीर्षक में ?
अरे जनाब शीर्षक में ही तो सब कुछ धरा है। मुखड़ा ही सुन्दर न होगा तो अंतरा कौन सुनेगा ?चेहरा ही सुन्दर न होगा तो जुगराफिया कौन निहारेगा ? भैये , चेहरे में दम हो तो चक्कू सी लड़की गोली सी घल जाती है ; हथिनी सी काया हिरनी सी चल जाती है। जिस तरह इंसान कि पहचान उसके चेहरे से होती है -लेख की पहचान उसके शीर्षक से लगाई जाती है। ये अलग बात है कि चेहरे पर मुखौटा हो अथवा शीर्षक हो झूठा।
    शीर्षक का तो इतना महत्व है कि लोग गुड़ के घोल पर शहद का लेबल देखकर चाट जाते हैं , करेले के रस की बोतल पर खस का शरबत लिखा देखकर गटागट करके पी जाते हैं और तो और दवा के नाम पर लोग ज़हर तक स्वाद से खा जाते हैं उस पर तुर्रा यह कि अनंत काल तक जीवित भी रहते हैं।
शीर्षक का महत्व और प्रभाव देखकर यदि आगे चलकर इस टी. वी. बाबाई चैनली भक्ति युग देखकर धार्मिक सीरियलों अथवा फिल्मों को इंटरनेट कनेक्टेड मोबाइल धारक ; कैशौर्य छोड़कर यौवन में पदार्पण कर रहे युवाओं में हिट करने के लिए  उनका नाम कूल-कूल  '' जय बजरंगबली '' अथवा ''जय माता दी ''न रखा जाकर हॉट - हॉट  ''मल्लिका'' अथवा  ''राखी''  जैसा  सैक्सी सैक्सी रखा  जाने लगे तो कोई आश्चर्य मत करने लग जाना ,धर्मशास्त्र पर कोकशास्त्र लिख लिख कर बेचा जाने लगे तो ये भी असंभव न समझना क्योंकि महान लोग कहते हैं नथिंग इज इम्पासिबल इन द वर्ल्ड।
अपने मुंह मिंयाँ मिट्ठू लोग इतने मनोवैज्ञानिक हो गए हैं कि चेहरा देखकर ही अंतर्मन कि बातें भांप जाते हैं किन्तु शीघ्र ही उन्हें पता चल जाता है कि जिसे वे राम समझ रहे थे वह लंकेश है और जिसे पुकार रहे थे  सीते सीते वह पामेला बोर्डेस है। मै तो कई बार ऐसे धोखे खा चुका हूँ फ़िर भी कुत्ते की दम मेरी नज़र जब भी ठहरती है तो चेहरे पर ही आई मीन शीर्षक पर ही। ऐसा मै मानता हूँ कि अब तो मैं इतना एक्सपर्ट हो चुका हूँ कि लिफाफा देखकर ही ख़त का मजमून समझ लेता हूँ। शीर्षक पढ़ते ही मुझे रचना का सारतत्व पता लग जाता है अतः उसे पढने की नौबत ही नहीं आती। लोग जाने कैसे घंटों घंटों अख़बार से चिपके रहते हैं मुझे तो एक ग्रन्थ निपटाने में भी इतना समय नहीं लगता।
खैर ! छोडिये इन सब बातों को ,बहुत हो गया मजाक। हाँ तो मैं अर्ज़ कर रहा था कि शीर्षक में क्या धरा है ? वास्तव में एक सही शीर्षक में सम्बद्ध रचना का सत्व निहित रहता है और यह शीर्षक का ही आकर्षण होता है कि हम उसके फेर में पड़कर पूरी रचना पढ़ जाते हैं किन्तु आजकल ये बात बहुत देखने में आ रही है कि पूरी रचना पढने के बाद भी कई शीर्षक उससे मेल नहीं खाते ;ठीक वैसे ही जैसे ' डर ' और 'अंजाम '
फिल्म  में हम शाहरुख खान को हीरो समझ लेते हैं और यदि क्लाइमेक्स न देखें तो ज़िंदगी भर उसे ही हीरो मानते रहें जबकि वो खलनायक है।
शीर्षक जितना ही आकर्षक देखते हैं रचना उतनी ही विकर्षक पाते हैं जैसे शीर्षक के महत्व को जानकर सारी प्रतिभा शीर्षक निर्माण में ही झोंक दी हो। यह शीर्षक का दुरूपयोग है। कई लोग शीर्षक पर ही लिखते हैं और कई रचना के उपरांत शीर्षक तय करते हैं। शीर्षक निकालना कोई बहुत आसान काम नहीं है तभी तो शेक्सपियर इससे डरते थे। एक बार वे अपनी शीर्षक विहीन रचना लेकर प्रकाशक के पास पहुंचे ,प्रकाशक ने शीर्षक पूछा उन्होंने जवाब दिया ''जैसा आप चाहें ''  लीजिये यही रचना का नाम पड़ गया किन्तु हर कोई तो शेक्सपियर नहीं होता कि उनके नाम से ही रचना बिक जाये अतः शीर्षक निर्माण में पर्याप्त सावधानी अपेक्षित होती है।
      'शीर्षक में सब कुछ धरा हैऔर 'शीर्षक में कुछ भी नहीं धरा ' दोनों बातें अपनी अपनी जगह सही हैं। कुछ लोग चेहरा देखते हैं कुछ मन।
प्रश्न अनुभव और ज्ञान का है कि आप कहाँ तक सही निकलते है ?

 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

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