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मुक्तक

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सब्र से कुर्सी पे भी सच बैठते कब हैं ?
नींद भी लेते खड़े ही लेटते कब हैं ?
हर तरफ़ माहौल बेशक़ ख़ूबसूरत है ,
आँख रखकर भी मगर हम देखते कब हैं ?
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

अक़्ल

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हैं उसके अक़्ल वाले द्वार बंद देखिए ।।
लेकिन दयालुता भरी पसंद देखिए ।।
करता है आज कौन उल्लुओं से दोस्ती ,
भैंसों से प्यार करता अक़्लमंद देखिए ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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पिताजी

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पाँव मुझ लँगड़े के दोनों , हाथ मुझ करहीन के ,
आँख मुझ अंधे की दो , बहरे के दोनों कान हैं ।।
यदि कोई मुझसे ये पूछे , हैं पिताजी क्या तेरे ?
झट से कह दूँगा नहीं कुछ किंतु मेरे प्रान हैं ।।
माँ की महिमा तो जगत में व्याप्त है आरंभ से ,
किंतु क्या माहात्म्य कम है मातृ सम्मुख पितृ का ?
यदि पिताजी पर कोई मुझसे कहे दो शब्द लिख ,
सच तुरत लेकर कलम लिख दूँगा मैं भगवान हैं ।।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 899 - ग़ुस्सा

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मेरे ग़ुस्से को फूँक - फूँक मत हवा दे तू ।। मैं भड़क जाऊँ उससे पहले ही बुझा दे ।। मैं बरस उट्ठा तो दुनिया बहा के रख दूँगा , अब्र को मेरे नीला आसमाँ बना दे तू ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 898 - ज़ुर्म

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ज़ुर्म वो साज़िशन रोज़ करते रहे ।।
दूसरे उसका ज़ुर्माना भरते रहे ।।
ज़ख़्म तो फूल ही दे रहे थे मगर ,
सारा इल्ज़ाम काँटों पे धरते रहे ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 897 - मैं कहाँ हूँ ?

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दिख रहा सबको वहीं बैठा जहाँ हूँ ।।
हूँ वहीं पर वाँ मगर सचमुच कहाँ हूँ ?
दिल मेरा आवारगी करता जिधर है ,
दरहक़ीक़त मैं यहाँ कब ? मैं वहाँ हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्त मुक्तक : 896 - देखते हैं

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कि बेख़ौफ़ हो हम न डर देखते हैं ।। मचल कर तेरी रहगुज़र देखते हैं ।। तू दिख जाए खिड़की पे या अपने दर पर , तेरे घर को भर-भर नज़र देखते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति