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Sunday, July 15, 2018

मुक्त-ग़ज़ल : 264 - पेचोख़म



   जब ज़ियादा मिल रहा क्यों कम मैं रख लूँँ ?
   है मयस्सर जब मज़ा क्यों ग़म में मैं रख लूँँ ?
   इक न इक दिन ज़ख्म तो वह देंगे आख़िर ,
   क्यों न लेकर आज ही मरहम मैं रख लूँँ ?
   इस क़दर प्यासी है सोचूँ इस नदी के
   वास्ते बारिश के कुछ मौसम मैं रख लूँँ !!
   उसकी क़िस्मत में नहीं का'बा पहुँँचना ,
   क्यों ना क़त्रा भर उसे ज़मज़म मैं रख लूँँ ?
   बस शराफ़त से बसर दुनिया में मुश्किल ,
   क्यों न ख़ुद में थोड़े पेचोख़म मैं रख लूँँ ?
   दुश्मनों के बीच रहने जा रहा हूँँ ,
   क्या छुरे-चाकू व गोले-बम मैं रख लूँँ ?
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, July 8, 2018

मुक्त-ग़ज़ल : 263 - रागा करें



   एक भी दिन का कभी हरगिज़ न हम नागा करें ।।
   एक उल्लू और इक हम रात भर जागा करें ।।
   उनपे हम दिन रात बरसाते रहें चुन-चुन के फूल ,
   हमपे वो गोले दनादन आग के दागा करें ।।
   जो हमारे कान के पर्दों को रख दे फाड़कर ,
   ऐसे सच से बचके कोसों दूर हम भागा करें ।।
   किस लिए तुम पूछते हो और हम बतलाएँँ क्यों ,
   उनके हम क्या हैं हमारे कौन वो लागा करें ?
   लोग धागे से यहाँँ हम लोहे की ज़ंजीर से ,
   खुल न जाएँँ कस के ऐसे ज़ख़्म को तागा करें ।।
   वो नहीं अच्छे मगर हैं ख़ूबसूरत इस क़दर ,
   हम तो क्या दुश्मन भी उनके उनसे बस रागा करें ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, July 2, 2018

मुक्त-ग़ज़ल : 262 - पागल सरीखा


   
   उसको रोने का यक़ीनन हर सबब पुख़्ता मिला ।।
   फिर भी वह हर वक्त लोगों को फ़क़त हंँसता मिला ।।
   मंज़िलों पर लोग सब आराम फ़रमाते मिले ,
   वह वहाँँ भी कुछ न कुछ सच कुछ न कुछ करता मिला ।।
   सब उछलते-कूदते जब देखो तब चलते मिले ,
   वह हमेशा ही समुंदर की तरह ठहरा मिला ।।
   " मैं तो खुश हूं सच बहुत खुश आंँख तो यूँँ ही बहे ,
   अपने हर पुर्साने ग़म से वह यही कहता मिला ।।
   अपने ज़ालिम बेवफ़ा महबूब के भी वास्ते ,
   हर जगह पागल सरीखा वह दुआ करता मिला ।।
   हर कोई इक दूसरे को कर रहा नंगा जहाँँ ,
   वह वहाँँ उघड़े हुओं पर कुछ न कुछ ढँकता मिला ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, June 30, 2018

मुक्त-ग़ज़ल : 261 - ग़ज़लें



नंगे पांँवों जब काँटों पर चलना आता था ।।
तब मुझ को तक़्लीफ़ में भी बस हंँसना आता था ।।
उसके ग़म में सच कहता हूंँ हो जाता पागल ,
मेरी क़िस्मत मुझको ग़ज़लें कहना आता था ।।
उसने मुंँह से कब कुछ बोला रब का शुक्र करो ,
मुझ को बचपन से आंँखों को पढ़ना आता था ।।
उसकी जाने कैसी-कैसी पोलें खुल जातीं ,
वो तो राज़ मुझे सीने में रखना आता था ।।
वह तन कर ही रहता था तो कट बैठा जल्दी ,
मैं हूंँ सलामत मुझको थोड़ा झुकना आता था ।।
इंसाँँ हूंँ यह सोच किसी को फुफकारा भी कब ,
वरना मुझ को भी सांँपों सा डसना आता था ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, June 28, 2018

मुक्त-ग़ज़ल : 260 - कैसे-कैसे लोग



   कैसे-कैसे लोग दुनिया में पड़े हैं ।।
   सोचते पाँवों से सिर के बल खड़े हैं ।।
   आइनों के वास्ते अंधे यहाँँ , वाँ
   गंजे कंघों की खरीदी को अड़े हैं ।।
   जिस्म पर खूब इत्र मलकर चलने वाले ,
   कुछ सड़े अंडों से भी ज्यादा सड़े हैं ।।
   बस तभी तक जिंदगी ख़ुशबू की समझो ,
   जब तलक गहराई में मुर्दे गड़े हैं ।।
   देखने में ख़ूबसूरत इस जहाँँ के ,
   आदमी कुछ बेतरह चिकने घड़े हैं ।।
   सिर न जब तक कट गिरा हम दम से पूरे ,
   ज़िंदगी से जंग रोज़ाना लड़े हैं ।।
   -डॉ. हीरालाल प्रजापति