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Thursday, January 10, 2019

विवाह आभार पत्र

             
आपने करबद्ध हो हम को नमन शत-शत किया ।।
अपना नीलाकाश से भी उच्च मस्तक नत किया ।।
झुक गए प्रत्येक बाराती भी आगे आपके ,
आपने कुछ इस तरह उनका सुहृद् स्वागत किया ।।
कौन करता है किसी का आजकल अब इस तरह ।।
आपने सम्मान हमारा सच किया है जिस तरह ।।
सोचते हैं हम बहुत अभिभूत होकर आपका ,
यदि करें आभार का प्रकटीकरण तो किस तरह ?
                                             - वर का पिता
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

विवाह अभिनंदन पत्र



कर सरस्वती को नमन प्रथम गणपति का वंदन करता हूँ ।।
हों कामनाएँ पूरी मेरी विनती मन ही मन करता हूँ ।।
हिय से हो भाव विभोर तुम्हें शत-शत अभिनंदित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ की ममता का यह सागर मेरे दिल का उजियाला है ।।
असमर्थ हूँ यह कहने में इसे किस वात्सल्य से पाला है ?
निज उरउद्यान की नर्म कली कर कमल तुम्हारे धरता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम गृह जब यह बिटिया जन्मी तब वंशी तक ना बज पाई ।।
पर आज विदा के क्षण गूँजे मेरे घर आँगन शहनाई ।।
प्रकृति का कैसा अजब नियम लेकिन परिपालित करता हूँ ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
माँ भ्रातृ बहन मामा मामी यादों में इसकी खोएँगे ।।
बिछड़ी जाती आज अपनों से यह सोच सिसक सब रोएँगे ।। 
अपनी आँखों का नूर तुम्हें सौंप और प्रकाशित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
मम हृदय नील अकाश चंद्र सम चम चम सा यह तारा था ।।
मैं अब तक जान न पाया क्यों इस पर अधिकार तुम्हारा था ? 
मैं पित्र कहाने का अपना हक़ तुम्हें विसर्जित करता हूँ ।।
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।।
नवगृह पढ़ना जा रामायण संविधान और भगवद् गीता ।। 
चलना उस पथ जिस राह चलीं सावित्री,अनुसुइया , सीता ।। 
इसका हो अटल सुहाग दुआ प्रभु से ये निवेदित करता हूँ  ।। 
यह कन्या रूप रतन तुमको मैं आज समर्पित करता हूँ ।। 
-एक पुत्री का पिता
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, December 31, 2018

नववर्ष



मरने पे या किसी के जन्मने पे नचेंगे ।।
जानूँ न क्यों वलेक लोग बाग जगेंगे ।।
तुम भी तमाशा देखने को रात न सोना ।।
मरने पे मेरे थोड़ा भी मायूस न होना ।।
31 दिसंबर मैं चीख़ दे ख़बर रहा ।।
01 जनवरी को जन्मा मैं नववर्ष मर रहा ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, December 23, 2018

मुक्त मुक्तक : 891 - दुशाला



चहुँदिस स्वयं को मैंने जिससे लपेट डाला ।।
ऊनी नहीं न है वो मृत वन्य मृग की छाला ।।
चलते हैं शीत लहरों के तीर जब बदन पे ,
बन ढाल प्राण रक्षा करता यही दुशाला ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, December 16, 2018

मुक्त ग़ज़ल : 270 - फ़ित्रत



हमने अजीब ही कुछ फ़ित्रत है पायी यारों ।।
हर बात धीरे-धीरे-धीरे ही भायी यारों ।।
उस तक पलक झपकते हम मीलों दूर पहुँचे ,
वह दो क़दम भी हम तक बरसों न आयी यारों ।।
उसको तो मौत ने भी ख़ुशियाँ ही ला के बाँटीं ,
हमको तो ज़िंदगी भी बस ग़म ही लायी यारों ।। 
भूखे रहे मगर हम इतना सुकूँ है हमने ,
औरों की छीनकर इक रोटी न खायी यारों ।।
बदली समंदरों पर जाकर बरसने वाली ,
हैराँ हूँ आज रेगिस्तानों पे छायी यारों ।।
ख़ुश हूँ कि ग़ुस्लख़ाने में आज उसने मेरी ,
दिल से ग़ज़ल तरन्नुम में गुनगुनायी यारों ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति