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मुक्तक : 920 - चाहत

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तुम्हीं एक से जिस्म आहत कहाँ है ?
किसी से भी इस दिल को राहत कहाँ है ?
अगर ख़ुश नहीं हूँ तो ये मत समझना ,
अभी मुझमें हँसने की चाहत कहाँ है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 276 - जिद्दोजहद

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बड़ी जिद्दोजहद से , कशमकश से , ख़ूब मेहनत से ।। न हो हैराँ मोहब्बत की है मैंने घोर नफ़रत से ।। 1 ।। हूंँ जो आज इस मुक़ाँ पर तो बड़ी ही मुश्क़िलों से हूँ , न इत्मीनान से , आराम से , ना सिर्फ़ क़िस्मत से ।। 2 ।। यक़ीनन जंग लड़कर ही किया मैंने भी हक़ हासिल , मिला कब माँगने से , इल्तिजा से , सिर्फ़ चाहत से ।। 3 ।। न जब राज़ी हुए थे वो मेरी दरख्व़ास्त सुनने को , मैं चढ़ बैठा था नीचे कूदने ऊँची इमारत से ।। 4 ।। वहाँ सख्त़ी से , बेदर्दी से उसने दिल किये टुकड़े , यहाँ तोड़ा न मैंने पत्थरों को भी नज़ाकत से ।। 5 ।। ज़रूरी तो नहीं सूरत अमीराना हो जिसकी वो , हक़ीक़त में हो दौलतमंद , ना हो तंग ग़ुर्बत से ।। 6 ।। ( जिद्दोजहद = पराक्रम , कशमकश = असमंजस , इल्तिजा = निवेदन , ग़ुर्बत = कंगाली ) -डॉ. हीरालाल प्रजापति

महामुक्तक : 919 - परिवर्तन

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जो दिया करते थे सौग़ातों पे सौग़ातें , आज वो ही लूटने हमको मचलते हैं ।। जो हमारे सिर का सारा बोझ ढोते थे , अब वही पैरों तले हमको कुचलते हैं ।। जो लगे रहते थे सचमुच इक ज़माने में , हाँ ! मिटाकर ख़ुद को हमको बस बनाने में , करके वो नुक़्साँ हमारा , ढेर दे तक़्लीफ़ , भर ख़ुशी से आज बंदर सा उछलते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

गीत : अर्द्ध शतक

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हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।1।।
जबकि अपनी उम्र का आधा शतक पूरा हुआ ।।2।।
क्या नहीं हमने किया मंज़िल को पाने वास्ते ।
रौंद डाले काँटों , अंगारों भरे सब रास्ते ।
कुछ ने कम मेहनत में भी है पा लिया अपना मुक़ाम ।
कुछ ने बैठे - बैठे ही हथिया लिया अपना मुक़ाम ।।
और इक हम हैं कि जिनका बिन रुके लंबा सफ़र ,
धीरे - धीरे रेंग कर , ना चल लपक पूरा हुआ ।।3।।
हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।
जबकि अपनी उम्र का आधा शतक पूरा हुआ ।।
हमने जिस दिन से कफ़न को बेचना चालू किया ।
ठीक उसी दिन से सभी लोगों ने मरना तज दिया ।
हाथ उनके आइने अंधों को सारे बिक गए ।
और कंघे भी निपट गंजों को सारे बिक गए ।
ख़्वाब उनका सोते-सोते हो गया सच और इधर ,
आँख खोलेे ना सतत पलकें झपक पूरा हुआ ।।4।।
हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।
जबकि अपनी उम्र का आधा शतक पूरा हुआ ।।
जाने कैसी-कैसी तदबीरें लगाते हम रहे ।
हर तरह की सोच-तरकीबें लगाते हम रहे ।
काम से कब हमने जी अपना चुराया था मगर ।
बल्कि ख़ुद को डूब कर उसमें भुलाया था मगर ।
काम सब के नाचते-गाते हुए सब बन गए ,
अपना इक भी हँसते-हँसते ना फफक पूरा हुआ ।।5।।
हाय मंसूबा नहीं इक अब तलक पूरा हुआ ।।
जबकि…

मुक्तक : 918 - गुलगुला

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तीखा मौसम मालपुआ , गुलगुला हुआ है ।। धरती गीली श्याम गगन अब धुला हुआ है ।। हम इसके आनन्द में रम ये भूल गये कब , बरखा बंद हुई पर छाता खुला हुआ है ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 917 - बिल

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जब कभी तू हर इक शख़्स का ख़्वाब थी , तू मेरा भी थी मक़्सद , थी मंज़िल कभी ।। आशिक़ों की तेरे जब बड़ी फ़ौज थी , उसमें चुपके से मैं भी था शामिल कभी ।। तू न माने ज़माने के आगे तो क्या , है हक़ीक़त मगर तुझको सारी पता , मेरे दिल में तेरी एक बड़ी माँद थी , तेरे दिल में था मेरा भी इक बिल कभी ।।  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 916 - झक

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उनके लिए जो मारते हैं झक अभी भी हम ? समझे नहीं ये बात आज तक , अभी भी हम ।। उनको नहीं सुहाते फूटी आँख हम मगर ! उनको ही ताकते हैं एकटक अभी भी हम ? -डॉ. हीरालाल प्रजापति