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290 : ग़ज़ल - चिढ़ है जन्नत से

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चिढ़ है जन्नत से न फिर भी तू जहन्नुम गढ़ ।।
अपने ही हाथों से मत फाँसी पे जाकर चढ़ ।।1।।
तुझको रख देंगी सिरे से ही बदल कर ये ,
शेर है तू मेमनों की मत किताबें पढ़ ।।2।।
तू जगह अपनी पकड़ रख नारियल जैसे ,
एक झोंके से निबौली-बेर सा मत झड़ ।।3।।
बन के क़ाबिल कर ले हासिल कोई भी हक़ तू ,
हाथ मत फैला किसी के पाँव मत गिर पड़ ।।4।।
बनके गंगा पाक रह औरों को भी कर साफ़ ,
इक जगह ठहरे हुए पोखर सा तू मत सड़ ।।5।। 
तान सीना सर उठाकर चल है गर मासूम ,
इस तरह से तू ज़मीं में शर्म से मत गड़ ।।6।। 
वो जो माल अपना भी औरों पर लुटा रखते ,
उनपे मत चोरी-जमाखोरी की तोहमत मढ़ ।।7।। 
पहले चौपड़ ताश ही मा'नी जुआ के थे ,
अब खुले मैदाँ के भी सब खेल हो गए फड़ ।।8।। 
सब ग़ुबार अपना निकल जाने दे मेरी हया ,
बाल के गुच्छों सी मत नाली में आकर अड़ ।।9।।
कितना ही कमज़ोर हो पर अपने दुश्मन से ,
होशियारी और सब तैयारियों से लड़ ।।10।।
टाट पे मखमल का मत पैबंद सिल पगले ,
क़ीमती हीरे को लोहे में नहीं तू जड़ ।।11।।
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

289 : ग़ज़ल - तकने लगे हैं शौक़ से

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तकने लगे हैं शौक़ से आईने अब अंधे ।।
गंजे अमीरुल-ऊमरा रखने लगे कंघे ।।1।।
जानूँ न वो कैसी बिना पर दौड़ते-उड़ते ,
ना पैर हैं उनके न उनकी पीठ पर पंखे ।।2।।
ये जायदादो मिल्क़ियत , माया , ख़ज़ाने सब ,
उनने जमा सचमुच किए कर-कर खरे धंधे ।।3।।
जितना बदन शफ़्फ़ाक़ है उनका कँवल सा वो ,
उतने ही हैं दिल के बुरे , नापाक औ' गंदे ।।4।।
ख़ुशियाँ हमेशा ही लगीं मानिंद ए फुट-इंच ,
ग़म लगे हमको प्रकाशी वर्ष से लंबे ।।5।।
मेहसूल भी देते जहाँ के लोग रो-रो कर ,
देंगे मदद के नाम पर क्या हँस के वो चंदे ?6।।
पीते नहीं कितने ही दारू बेचने वाले ,
मालिक न लेकिन कपड़ा मिल के रह सकें नंगे ।।7।। 
उसका है जीने का तरीक़ा मुफ़्लिसों जैसा ,
कितने ख़ज़ानों पर मगर उसके गड़े झंडे ।।8।।
जब मानते ही तुम नहीं मौज़ूदगी रब की ,
क्यों बाँधते हो हाथ में ता'वीज़ औ' गंडे ।।9।।
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 288 - गाली

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चाहता हूँ कि बकूँ उसको गाली पे गाली ।।
लफ़्ज़ बस मुँह से निकलते हैं दो ही हट , साली ।।1।।
हुस्न से लगती है मंदिर की सीता-राधा वो ,
है तवाइफ़ के भी क़िरदार से बड़ी वाली ।।2।।
शाहख़र्च इतनी है इतनी कि हो यक़ीं कैसे ,
वो किया करती है दिन-रात सिर्फ़ हम्माली ।।3।।
अपनी बोली से तो कोयल का चूज़ा लगती है ,
है इरादों से मगर ख़ौफ़नाक और काली ।।4।।
जब जला लेती है होली दिलों की रूई सी ,
तब मनाती है शबोरोज़ ईद-दीवाली ।।5।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 287 - भारी-भरकम

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बाहर रेल की पटरी से भारी-भरकम ।।
अंदर बाँस से भी कुछ हल्के-फुल्के हम ।।1।।
थककर चूर हैं लेकिन ख़ुद को जाने क्यों ?
दिखलाते हैं हमेशा इकदम ताज़ादम ।।2।।
चेहरे से यूँ नदारद रखते हर पीड़ा ,
बस सब लोग समझ जाते हम हैं बेग़म ।।3।।
मैक़श से न कभी कहना मै को गंदी ,
उसका मक्का है मैख़ाना , दारू ज़मज़म ।।4।।
भागमभाग किया करते , सब है फिर भी ,
क्यों जीने की ही ख़ातिर होते हैं बेदम ।।5।।
कुछ ही अंधे करें मिल बातें चश्मों की ,
लँगड़े ख़्वाब में सब नाचें ना छम-छम-छम ।।6।।
पैसा बंद हुआ रुपया भी कमक़ीमत ,
महँगे सब तो हुए डॉलर , दीनारोदिरम ।।7।।
हैराँ हूँ हैं जनाज़े में शामिल लाखों ,
लेकिन दिखती नहीं इक की भी आँखें नम ।।8।।
माना पास नहीं अपने लेकिन ख़ुश हैं ,
जाएदाद , ज़मीं , सोना-चाँदी सी रक़म ।।9।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 286 - मानते हैं

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इक उनका बुत बनाने मिट्टी को छानते हैं ।। अपना लहू मिलाकर फिर उसको सानते हैं ।। हैराँ न वो हमारे , रोने पे हो रहे हैं , हों मस्ख़रों को भी ग़म , शायद वो जानते हैं ।। मैं उनको जाँ भी दे दूँ , वो ख़ुश ज़रा न होंगे , जाँ मुफ़्त की है मेरी ऐसा जो मानते हैं ।। जिनको भुलाना शायद , मुमकिन न हो सकेगा , उनको ही भूल जाने , की रोज़ ठानते हैं ।। कहते हैं " हम नशे का मतलब नहीं समझते " , वो रोज़-रोज़ ख़ुद ही , जो भंग छानते हैं ।। छोटी से छोटी बातों पर लोग-बाग अब तो , फटकार-डाँट की जा , बंदूक तानते हैं ।। अब सब्रो-ज़ब्त किसमें बाक़ी ज़रा-ज़रा में , बूढ़े भी नौजवानों सा ख़ूँ उफानते हैं ।। -डॉ. हीरालाल प्रजापति

मुक्तक : 949 - तक़दीर

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पार जो करता हमें ख़ुद डूब वो बजरा गया रे ;
अब अगर होगा लिखा तक़दीर में लगना कनारे -
तो यक़ीनन ग़र्क़े दरिया हों कि उससे पहले आकर ,
देखना तिनके बचा लेंगे हमें देकर सहारे ।।
( बजरा = बड़ी नाव , कनार = तट , ग़र्क़े दरिया = नदी में डूबना )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

ग़ज़ल : 285 - बदनसीब हरगिज़ न हो

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चोर हो , डाकू हो , क़ातिल हो , ग़रीब हरगिज़ न हो ।।
आदमी कुछ हो , न हो बस , बदनसीब हरगिज़ न हो ।।
ज़िंदगी उस शख़्स की , क्या ज़िंदगी है दोस्तों ,
गर जहाँ में एक भी , जिसका हबीब हरगिज़ न हो ।।
हक़ नहीं बीमार होने , का उसे जिसकी न याँ -
हो सके तीमारदारी , औ' तबीब हरगिज़ न हो ।।
हमको कब लाज़िम फ़रिश्ता , और कब शैतान ही ,
चाहिए इक आम इंसाँ , जो अजीब हरगिज़ न हो ।।
कोह पर चढ़ते हुए हो , सर पहाड़ी बोझ क्या ,
पीठ पर लेकिन किसी के , भी सलीब हरगिज न हो ।।
इक क़लमकार , उम्दा शायर , होके तू भूखा मरे ,
उससे बेहतर मस्ख़रा बन , जा अदीब हरगिज़ न हो ।।
( तबीब = चिकित्सक , कोह = पहाड़ )
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति