Pages - Menu

Disclamer

All posts are covered under copyright law . Any one who wants to use the content should take permission the author before reproducing the post in full or part in blog medium or print medium by any other way.Indian Copyright Rules

Sunday, March 17, 2019

दोहा ग़ज़ल


वो जब अपने सामने , पड़ जाते हैं यार ।।
होश गवाँ करने लगें , हम उनके दीदार ।।
हँसते हैं जब वो यही , होता है महसूस ,
जैसे खनकें पायलें , कोयल गाए मल्हार ।।
जिनसे इश्क़ हक़ीक़तन , करते हम कमबख़्त ,
वो ग़ैरों के प्यार में , रहते हैं बीमार ।।
उनके हिज्र में रात यों , बरसी आँखें दोस्त ,
ज्यों सावन में भी नहीं , होती धारासार ।।
उनकी खुशियों का वहाँ , कोई ओर न छोर ,
अपने भी ग़म का न याँ , दिखता पारावार ।।
उनकी आँख में आज भी , हम कोल्हू के बैल ,
पहले भी बेकार थे , अब भी हैं बेकार ।।
वह जब तक अपना रहा , दुनिया लगी हबीब ,
वह जब ग़ैर हुआ हुआ , ज्यों बैरी संसार ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, March 10, 2019

मुक्त ग़ज़ल : 272 - मुक्का-लात



  किस मज्बूरी के चलते यह बात हुई है ?
  जो अंधों के आगे नचते रात हुई है ।।
  हैराँ हूँ सुनकर इक बुलबुल के हाथों कल ,
  अंबर में बाज़ों की भारी मात हुई है ।।
  झूठ है सिर्फ़ अमीर ही बख्श़िश दें जग में , क्या 
  मँगतों के हाथों न कभी ख़ैरात हुई है ?
  भूखे सिंह को ज्यों बकरी भी दिखती हिरनी ,
  उनकी आँखों में यूँ मेरी औक़ात हुई है ।।
  रेगिस्तान तरसते रोते याँ बदली को , 
  वाँ दिन-रात समंदर में बरसात हुई है ।।
  तुम क्या जानो हम क्यों रोज़ ज़हर पीते हैं ?
  हम ही जानें हमको मौत हयात हुई है ।।
  वे दोनों गाँधीवादी हैं पर उनमें भी ,
  मेरे आगे अक्सर मुक्का-लात हुई है !!
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, March 3, 2019

ग़ज़ल मुक्तक




बुलाके पास जो 
आवारा क़िस्म कुत्ते को ,
खिलाके बिस्कुट और 
सिर्फ़ एक हड्डे को ,
सुनाने बैठ गया 
अपनी अनसुनी ग़ज़लें ,
अदब से वो भी खड़ा 
हो गया था सुनने को ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, February 28, 2019

काग


  चोंच से खींचकर काग आँचल तेरा ।।
  बोले उससे भी काला है काजल तेरा ।।
  रंग पूनम से उजला , अमावस लटें ,
  मुख तो अमृत सा पर मन हलाहल तेरा ।।
  -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, February 24, 2019

मुक्त ग़ज़ल : 271- कनीज़


मैं तो सिर्फ़ एक कनीज़ हूँ ।।
तुम्हें किस लिए फिर अज़ीज़ हूँ ?
हूँ खिलौना मुझसे लो खेल लो ,
कि मैं आदमी नहीं चीज़ हूँ ।।
मुझे तुम धुएँ में ले आए फिर ,
मैं दमा का जबकि मरीज़ हूँ ।।
मुझे मारने का है हुक़्म उसे ,
कि मैं जिसका जानी हफ़ीज़ हूँ !!
न छुपाए पुश्त न सीना ही ,
मैं वो तार - तार कमीज़ हूँ ।।
न निगाह देख के मैली कर -
मुझे मैं बहुत ही ग़लीज़ हूँ ।। 
न उठाके गोदी में ले मुझे ,
बड़ा भारी और दबीज़ हूँ ।।
-डॉ. हीरालाल प्रजापति