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Tuesday, February 28, 2017

*मुक्त-ग़ज़ल : 226 - अजब कर रहा है ॥



न जाने वो क्या किस सबब कर रहा है ?
मगर इतना तै है गज़ब कर रहा है ॥
वही जाने क्या उसका मक़सद है लेकिन ,
लगे है कि वो कुछ अजब कर रहा है ॥
वो ख़ुद अपने मुंसिफ़ से अपने गुनह की ,
सज़ा आगे बढ़ – बढ़ तलब कर रहा है ॥
करे जितनी सूरज की इज्ज़त वो उतना ,
चिराग़ों का भी बढ़ अदब कर रहा है ॥
वो अपने नहीं ग़ैर के ख़्वाब को सच ,
बनाने का हर एक ढब कर रहा है ॥
बहुत धीरे – धीरे मगर जाने जाँ को ,
वो अपनी ही अब अपना रब कर रहा है ॥
फ़क़त रूह का मेरी तालिब वो बंदा ,
मेरा जिस्म भी अब तलब कर रहा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, February 25, 2017

गीत : माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥



माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥
और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥
तितलियाँ माँगूँ तो देना तितलियाँ लाकर ।
चीटियाँ माँगूँ तो देना चीटियाँ लाकर ।
सौंपना चूहा ही यदि चूहा मंगाऊँ मैं ,
मत कभी उसकी जगह हाथी मुझे देना ॥
माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥
और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥
फूल माँगा जाए तो कलियाँ न ले आना ।
फल मंगाया जाए तो फलियाँ न ले आना ।
चाहिए कोंपल तो देना मत मुझे पत्ता ,
मैं तना माँगूँ तो मत डाली मुझे देना ॥
माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥
और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥
ऊन माँगूँ ऊन के गोले बना लाना ।
सूत माँगूँ सूत के लच्छे बना लाना ।
टाट माँगूँ तो न देना तुम मुझे मख़मल ,
न रेशम की जगह खादी मुझे देना ॥
माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥
और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥
यदि कहूँ लोहा तो लोहा ला पटकना तुम ।
यदि कहूँ पीतल तो पीतल आ के रखना तुम ।
मैं खरा सोना जो चाहूँ तुमसे रत्ती भर ,
उसके बदले मत किलो चाँदी मुझे देना ॥
माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥
और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥
यदि कहूँ मैं चर्च चलने चर्च चल पड़ना ।
यदि कहूँ गुरुद्वारा गुरुद्वारे निकल पड़ना ।
मैं मदीना चाहूँ तो देना न तुम मक़्क़ा ,
मथुरा के एवज़ मुझे काशी नहीं देना ॥
माँगता हूँ जो वही साथी मुझे देना ॥
और जितना चाहूँ उतना ही मुझे देना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, February 12, 2017

*मुक्त-ग़ज़ल : 225 - हीरा हूँ मैं



हीरा हूँ मैं वो मुझको अच्छे से जानता है ॥
फिर भी हमेशा मुझमें नर्मी तलाशता है ॥
जिस कान ने न मुझको सुनने की ली क़सम है ,
मेरा गला उसी को आवाज़ मारता है ॥
वह कबसे आस्माँ में सूराख़ को बनाने ,
बेकार में ही दिन भर पत्थर उछालता है ॥
मुझमें बड़ी - बड़ी जो वो ख़ूबियाँ न देखे ,
चुन - चुन के छोटी - छोटी कमियाँ निकालता है ॥
रहता वो चुप ही या फिर करता है बात ऐसे ,
जैसे भड़ास कोई अपनी निकालता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति