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Sunday, January 29, 2017

गीत : तुम क्या जानो दुख पायल का ?



तुम क्या जानो दुख पायल का ,
तुमको तो छन – छन से मतलब ?
चूड़ी कितनी चिटके – टूटे ,
तुमको बस खन – खन से मतलब ?
तुमको बस अच्छे लगते वो
मेंढक जो टर्राते हैं सच ।
गाने वालों  से ज़्यादा प्रिय
तुमको जो चिल्लाते हैं सच ।
तुमको कोयल की कूकें ,
बुलबुल के नग्में कब जँचते रे ?
टकराहट से निकले कर्कश -
स्वर ही तुमको भाते हैं सच ।
तुम क्या समझो ठुकती कीलों
के माथे की पीड़ा को हाँ ?
कितनी चोटें सहता घण्टा ?
तुमको बस टन – टन से मतलब ॥
चूड़ी कितनी चिटके – टूटे ,
तुमको बस खन – खन से मतलब ?
हर पल चौकन्ना रहता
बचता फिरता निश – भोर पवन से ।
कठिनाई से ख़ुद को रखता
दीप्त घिरा चहुंओर पवन से ।
वह उस पाटल की पंखुड़ियों सा
कोमल जो झड़ जाता रे ,
अश्वचलन से चलने वाली
अंधड़ सी घनघोर पवन से ।
तुमको साँय – साँय जो प्यारी
वो दीपक को हाहाकारी ,
तुम क्या जानो उसके भय को ?
तुमको बस सन – सन से मतलब ॥
चूड़ी कितनी चिटके – टूटे ,
तुमको बस खन – खन से मतलब ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, January 26, 2017

*मुक्त-ग़ज़ल : 224 - मैं इश्क़ में मानूँ



वो दैर जाता कभी दिखे तो कभी हरम को ॥
भुला के आता हूँ मैक़दे में मैं अपने ग़म को ॥
वो मानता कब ख़ुदा किसी को सिवा ख़ुदा के ,
मैं इश्क़ में मानूँ अपना रब अपने ही सनम को ॥
वो रह्म दिल है मैं कैसे मानूँ तरस रहा जब ,
कई ज़मानों से उसके मुझ पर किसी करम को ॥
मैं इंतज़ार उसका करते - करते थका हूँ इतना ,
कि सच लगे है पहुँच न जाऊँ अभी अदम को ॥
हमें मिटाकर मिली मसर्रत उन्हे किलो भर ,
मिली हैं मिटकर के उनसे खुशियाँ टनों से हमको ॥
हमेशा कमज़ोरियों पे उसकी नज़र पड़ी है ,
मेरी निगाहों ने जब भी देखा तो देखा दम को ॥
न होता उससे जो दिल का रिश्ता तो झेलता क्या ,
मैं उसके हँस – हँस के अपने दिल पे किये सितम को ?
जो माँगता हूँ वो दे – दे मुझको मैं मान लूँगा ,
ज़ियादा से भी ज़ियादा तेरे ज़ियादा कम को ॥
( दैर = मंदिर , हरम = मस्जिद , मैक़दे = मदिरालय , अदम = यमलोक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, January 22, 2017

*मुक्त-ग़ज़ल : 223 - तुम मेरी बाँहों में कुछ पल



या मेले में सँग मेरे कल्लोलो तो ॥
या एकांत में कांधे सर धर रो लो तो ॥
सुनकर तुमको बहरापन मेरा जाता ,
क्यों चुप हो ? संकेतों से ही बोलो तो ॥
क्यों रहते हो कुछ दिन से गुमसुम-गुमसुम ?
क्या रहस्य है अपने मन का ? खोलो तो ॥
तुम चट्टान हो तो मैं भी इक पर्वत हूँ ,
मैं भी डिग जाऊँगा यदि तुम डोलो तो ॥
मुझको मिल जाएगा स्वर्ग धरा पर ही ,
तुम मेरी बाँहों में कुछ पल सो लो तो ॥
मैं सम्पूर्ण तुम्हारा हो जाऊँगा सच ,
तुम थोड़े बस थोड़े मेरे हो लो तो ॥
मुझ पर मैल लगा है कोई दाग़ नहीं ,
निष्कलंक हो जाऊँगा यदि धो लो तो ॥
सप्त रँगों से क्या तुम से तो मैं हँस-हँस ,
रँगवा लूँ ख़ुद को कालिख भी घोलो तो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, January 1, 2017

कितने अकबर ओ कितने सिकंदर हुए



कितने अकबर ओ कितने सिकंदर हुए ॥ 
आख़िरश मौत को सब मयस्सर हुए ॥ 
जेब किसके कफ़न में हुआ आज तक ,
वो हुए शाह या धुर फटीचर हुए ॥ 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-ग़ज़ल : 222 - वो परिंदे



जितना आँखों से उसको हटाता गया ॥
उतना दिल में वो मेरे समाता गया ॥
यों वो आया था देने तसल्ली मगर ,
जाते - जाते मुझे फिर रुलाता गया ॥
क्या कहूँ रहनुमा ही मेरी राह में ,
जाल बुन-बुन के गिन-गिन बिछाता गया ॥
वो परिंदे जो मुश्किल से फाँसे गए ,
सारे सय्यादों के वो छुड़ाता गया ॥
एक ही आग के दो असर देखिए ,
मैं बुझाता रहा ; वो जलाता गया ॥
कैसे रहता सलामत मेरे पास कुछ ,
मैं बनाता रहा वो मिटाता गया ॥
इस क़दर मैंने गुस्सा दिलाया उसे ,
गालियाँ ; गाने वाला सुनाता गया ॥
रौ में इक दिन नशे की वो बहकर मुझे ,
हर दबा राज़ दिल का बताता गया ॥
पेट भरने की ख़ातिर वो मुफ़्लिस चने ,
रोज़ लोहे के चुन – चुन चबाता गया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति