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Monday, November 13, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 244 - जर्जर मकान



कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ॥
सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ॥
उसकी आवाज़ की लज़्ज़त की पूछ मत तारीफ़ ,
गंदी गाली भी उसकी इक अजान लगती है ॥
एक हम हैं कि बचपने में भी लगें बूढ़े ,
भर बुढ़ापे में भी वो नौजवान लगती है ॥
करती फिरती है निगाहों से सबके क़त्ल मगर ,
सख़्त हैराँ हूँ सबको अपनी जान लगती है ॥
लाजवाब है वो बेमिसाल है जुदा है वो ,
वो न इस जैसी न उसके समान लगती है ॥
है वो मज़्बूत क़िला , ताज सा महल अंदर ,
सिर्फ़ बाहर से वो जर्जर मकान लगती है ॥
जिसको देखो उसे ही चुप कराता फिरता है ,
                                            मुझको वो बोलती भी बेज़ुबान लगती है ॥ 
                                                          -डॉ. हीरालाल प्रजापति


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