Pages - Menu

Disclamer

All posts are covered under copyright law . Any one who wants to use the content should take permission the author before reproducing the post in full or part in blog medium or print medium by any other way.Indian Copyright Rules

Monday, May 29, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 233 - कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े



पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥
औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ लँगड़े ॥
प्यार था उनसे हमें बेइंतहा सचमुच ,
बेवजह करते रहे उनसे मगर झगड़े ॥
फूलों पे गिरकर भी कोई कट सका हम भी ,
आरियों , तलवारों पे गिरकर हुए टुकड़े ॥
नाव ने हमको डुबोने में कसर कब की ,
हम किनारे आए तिनका दाँत से पकड़े ॥
हम थे भूखे हमने पहले रोटियाँ चाहीं ,
बाक़ी नंगे चिल्ला-चिल्ला मर गए कपड़े ॥
हम भी बुनना सीख लेते जाल भी लेकिन ,
क्या करें हम आदमी थे ; थे नहीं मकड़े ॥
चढ़ गया हम पर मुलम्मा इक टिकाऊ सा ,
ज़िंदगी से इस क़दर हम हैं गए रगड़े ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Post a Comment