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Saturday, December 2, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 247 - परदेस में.........



देस से परदेस में आकर हुआ मैं ॥
सेर भर से एक तोला भर हुआ मैं ॥
रेलगाड़ी जब से पाँवों से है गुज़री ,
सच में उस दिन से ही यायावर हुआ मैं ॥
कब रहा काँटा मैं गुस्से में भी कल तक ,
प्यार में भी आजकल खंजर हुआ मैं ॥
हो गया था आदमी जानूँ न कैसे ,
फिर वही पहले सा इक बंदर हुआ मैं ॥
एक वो रहने लगे क्या दिल में मेरे ,
कमरे से होटल के यारों घर हुआ मैं ॥
देखकर बर्ताव दुनिया का गुलों सँग ,
मोम से इक सख़्ततर पत्थर हुआ मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, November 26, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 246 - क़ब्र खोदने को ......


हैराँ हूँ लँगड़े चीतों सी तेज़ चाल लेकर ॥
चलते हैं रोशनी में अंधे मशाल लेकर ॥
हुशयारों से न जाने करते हैं कैसे अहमक़ ,
आज़ादियों के चर्चे हाथों में जाल लेकर ॥
चलते नहीं उधर से तलवार , तीर कुछ भी ,
जाते हैं फिर भी वाँ सब हैराँ हूँ  ढाल लेकर !!
हरगिज़ कुआँ न खोदें प्यासों के वास्ते वो ,
बस क़ब्र खोदने को चलते कुदाल लेकर ॥
माथे नहीं हैं जिनके उनके लिए तिलक को ,
कुछ लोग थालियों में घूमें गुलाल लेकर ॥
कुछ माँगने चला हूँ तो लाज़मी यही है ,
जाऊँ मैं उनके आगे मँगतों सा हाल लेकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, November 14, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 245 - धूप क्या होती है

                                         

एक पतला जानकार पापड़ तला वो ॥
बिन हथौड़ा तोड़ने मुझको चला वो ॥
धूप क्या होती है दुख की , क्यों वो जाने ?
सुख के साये में हमेशा ही पला वो ॥
फूँककर पीता है गर जो छाछ को भी ,
दूध का होगा यक़ीनन इक जला वो ॥
है नहीं मँगता मगर जब जब भी आया ,
दर से मेरे कुछ लिये बिन कब टला वो ॥
जो मुकर जाता है अपनी बात से फिर ,
आदमी तो है मगर इक दोग़ला वो ॥
आज के हालात ने ही उसको बदला ,
कल तलक इंसान था इक सच भला वो ॥
राधिका उसको मिली कैसे हूँ हैराँ ?
जबकि रत्ती भर नहीं है साँवला वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, November 13, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 244 - जर्जर मकान



कल वो दिखती थी तुलसी आज पान लगती है ॥
सच में गीता तो वो कभी क़ुरान लगती है ॥
उसकी आवाज़ की लज़्ज़त की पूछ मत तारीफ़ ,
गंदी गाली भी उसकी इक अजान लगती है ॥
एक हम हैं कि बचपने में भी लगें बूढ़े ,
भर बुढ़ापे में भी वो नौजवान लगती है ॥
करती फिरती है निगाहों से सबके क़त्ल मगर ,
सख़्त हैराँ हूँ सबको अपनी जान लगती है ॥
लाजवाब है वो बेमिसाल है जुदा है वो ,
वो न इस जैसी न उसके समान लगती है ॥
है वो मज़्बूत क़िला , ताज सा महल अंदर ,
सिर्फ़ बाहर से वो जर्जर मकान लगती है ॥
जिसको देखो उसे ही चुप कराता फिरता है ,
                                            मुझको वो बोलती भी बेज़ुबान लगती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Friday, October 27, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 243 - राख़ हो जाता है सब कुछ.....



नज़र से गिरके उठने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
गड़े मुर्दे के चलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
ज़ुबाँ रखकर भी चुप रहते हैं कितने ही ज़माने में ,
मुझे गूँगे के कहने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
कि पड़कर राख़ हो जाता है सब कुछ आग में मुझको ,
भरी बारिश में जलने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
कई क़िस्से सुने लोगों से तलवारों से कटने के ,
मुझे फूलों से कटने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
बहुत मज़्बूर होकर भूख से जंगल के राजा हो _
कहीं भी घास चरने का किसी का वाक़िआ बतला ॥
( वाक़िआ = घटना , वृतांत )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, October 21, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 242 - महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥


गड़ता कम भुंकता बुरा हूँ ॥
पिन नहीं पैना छुरा हूँ ॥
एक सिर से पाँव दो तक ,
कोयले ही से पुरा हूँ ॥
हड्डियों सा हूँ कभी , कभी _
बिस्कुटों सा कुरकुरा हूँ ॥
काठ का पहिया हो गर तुम ,
मैं भी लोहे का धुरा हूँ ॥
सबके दाँतों को हूँ कंकड़ ,
तुझ चबाने मुरमुरा हूँ ॥
सबको गंगा-जल उन्हे ही ,
महुए की कच्ची सुरा हूँ ॥
अपनी मर्ज़ी से लुटा , कब
मैं चुराने से चुरा हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, August 28, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 241 - मैं हूँ लोहे का चना



राख़ को आग बनाने की न कर कोशिश तू ॥
मर चुका हूँ मैं जगाने की न कर कोशिश तू ॥ 1 ॥
मुझको मालूम है कितना तू भरा है ग़म से ,
दर्द हँस – हँस के छिपाने की न कर कोशिश तू ॥ 2 ॥
मैं तलातुम में किनारों से तो बचकर आया ,
मुझको फिर पार लगाने की न कर कोशिश तू ॥ 3 ॥
ऊँची मीनार से दे दे तू यक़ीनन धक्का ,
अपनी आँखों से गिराने की न कर कोशिश तू ॥ 4 ॥
मैं हूँ लोहे का चना मुझको समझकर किशमिश ,
अपने दाँतों से चबाने की न कर कोशिश तू ॥ 5 ॥
दिल मेरा भाग गया कब का चुराकर कोई ,
मुझको बेकार रिझाने की न कर कोशिश तू ॥ 6 ॥
( तलातुम = बाढ़ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 19, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 240 - आग से ठंडी......



हँसना मत , हैराँ न होना देखकर मेरा जतन ॥
कर रहा हूँ आग से ठंडी जो मैं अपनी जलन ॥
कैसे कर जाते हैं लोग इसकी बुराई या ख़ुदा ,
मुझको तो जैसा भी है लगता है जन्नत सा वतन ॥
दिल नहीं चाँदी हो , सोना गर नहीं हो रूह तो ,
है वो ख़ुशबूदार फूलों से निरा खाली चमन ॥
उनसे तुरपाई को माँगी थी मदद ले आये वो ,
तेग़ सूई की जगह धागे की जा मोटी रसन ॥
( हैराँ =चकित ,रूह =आत्मा ,निरा खाली =सर्वथा रिक्त ,तेग़ =तलवार ,जा =जगह ,रसन =रस्सी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, August 8, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 239 - मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ



मग्ज़ की कब सिर्फ़ दिल की सुन रहा हूँ ॥
अनगिनत ख़्वाब उनको लेकर बुन रहा हूँ ॥
हो गया हूँ आज मीठा पान उनका ,
जिनको कल तक प्याज औ लहसुन रहा हूँ ॥
पूस का जाड़ा कभी तो जेठ की लू ,
मैं कभी सावन कभी फागुन रहा हूँ ॥
मैं हमेशा ही नगाड़े की न ढम - ढम ,
घुंघरुओं की भी मधुर रुनझुन रहा हूँ ॥
जो मिला चुपचाप उसी को रख लिया कब ,
अपनी मर्ज़ी से मैं कुछ भी चुन रहा हूँ ?
जिसको पाने जान तक की की न पर्वा ,
आज उसे ही पाके सिर को धुन रहा हूँ ॥
जब से वो मेरी हिफ़ाज़त भूल बैठे ,
दाल – गेहूँ की तरह ही घुन रहा हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 27, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 873 - कच्ची मिट्टी



गलता बारिश में कच्ची मिट्टी वाला ढेला हूँ ॥
नेस्तोनाबूद शह्र हूँ मैं उजड़ा मेला हूँ ॥
देख आँखों से अपनी आके मेरी हालत को ,
तेरे जाने के बाद किस क़दर अकेला हूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, July 22, 2017

खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है



खुल के अफ़वाहों का बाज़ार गर्म करता है ॥
सच के कहने को तू सौ बार शर्म करता है !!
जब तू बाशिंदा है घनघोर बियाबानों का ॥
क्यों तू मालिक है शहर में कई मकानों का ?
तुझसे सीखे कोई सौदागरी का फ़न आकर ॥
आईने बेचे तू अंधों के शहर में जाकर !!
दिल तिजोरी में करके बंद अपना बिन खो के ॥
इश्क़ करता तू यों सर्पों से नेवला हो के !!
लोमड़ी आके तेरे द्वार पे भरती पानी ॥
तेरा चालाकियों में दूसरा कहाँ सानी ?
तुझसा जीने का हुनर किसने आज तक जाना ?
मैंने उस्ताद अपना तुझको आज से माना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, July 13, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 238 - द्रोपदी न समझो ॥



बारिश में बहते नालों 
ख़ुद को नदी न समझो ॥
लम्हा तलक नहीं तुम 
ख़ुद को सदी न समझो ॥
अच्छे के वास्ते गर 
हो जाए कुछ बुरा भी ,
बेहतर है उस ख़राबी 
को कुछ बदी न समझो ॥
दिखने में मुझसा अहमक़ 
बेशक़ नहीं मिलेगा ,
लेकिन दिमाग़ से मुझ 
को गावदी न समझो ॥
पौधा हूँ मैं धतूरे 
का भूलकर भी मुझको ,
अंगूर गुच्छ वाली 
लतिका लदी न समझो ॥
जिसको वरूँगी मेरा 
पति बस वही रहेगा ,
सीता हूँ मैं मुझे तुम 
वह द्रोपदी न समझो ॥
(बदी = पाप , अहमक़ = भोंदू , गावदी = बेवकूफ़ )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति