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Friday, June 16, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 871 - इश्क़ की तैयारियां



छोड़कर आसानियाँ सब 
माँगता दुश्वारियाँ वो ॥
चाहता सेहत नहीं क्यों 
चाहता बीमारियाँ वो ॥
इक पुराना बेवफ़ा बस 
भूलकर बैठा ही है इत ;
उठके उत करने लगा 
नए इश्क़ की तैयारियां वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Monday, May 29, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 233 - कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े



पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥
औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ लँगड़े ॥
प्यार था उनसे हमें बेइंतहा सचमुच ,
बेवजह करते रहे उनसे मगर झगड़े ॥
फूलों पे गिरकर भी कोई कट सका हम भी ,
आरियों , तलवारों पे गिरकर हुए टुकड़े ॥
नाव ने हमको डुबोने में कसर कब की ,
हम किनारे आए तिनका दाँत से पकड़े ॥
हम थे भूखे हमने पहले रोटियाँ चाहीं ,
बाक़ी नंगे चिल्ला-चिल्ला मर गए कपड़े ॥
हम भी बुनना सीख लेते जाल भी लेकिन ,
क्या करें हम आदमी थे ; थे नहीं मकड़े ॥
चढ़ गया हम पर मुलम्मा इक टिकाऊ सा ,
ज़िंदगी से इस क़दर हम हैं गए रगड़े ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, April 22, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 232 - मीर के दीवान बिकते हैं ?



कहीं पर रात में आधी ; सजे अरमान बिकते हैं ॥
कहीं पर दिन दहाड़े मौत के सामान बिकते हैं ॥
ख़रीदें ज्यों लतीफों की किताबें लोग हाथों हाथ ,
नहीं क्यों दाग़ , ग़ालिब , मीर के दीवान बिकते हैं ?
कहीं पर लोग लोगों की बचा देते हैं जाँ यों ही ,
कहीं अपनों के अपनों पर किए एहसान बिकते हैं ॥
हवा मुँहमाँगी क़ीमत पे वहाँ बिकती है लेकिन मुफ़्त,
अगरबत्ती , इतर , क़ाफ़ूर औ लोबान बिकते हैं ॥
अगर लग जाएँ ऊँची बोलियाँ तो फिर जहाँ में सच ,
याँ अच्छे अच्छों के हाँ दीं , ज़मीर , ईमान बिकते हैं ॥
( लतीफों = चुटकुलों , दीवान = एक विशिष्ट प्रकार का ग़ज़ल संग्रह , इतर = इत्र , क़ाफ़ूर = कपूर , दीं = धर्म )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, April 16, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 231 - ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन



ख़ुश वो मुझको यों हमेशा ही रुला के होते हैं ॥
राधिका को कृष्ण ज्यों झूला झुला के होते हैं ॥ 1 ॥
याद तेरी जो न आए तो मैं रो पड़ता हूँ याँ ,
सब जहाँ ख़ुश बेवफ़ाओं को भुला के होते हैं ॥ 2 ॥
अपने पैरों को वो मेरे आँसुओं की धार से ,
ख़ुश बहुत ख़ुश आए दिन टप-टप धुला के होते हैं ॥ 3 ॥
सामने ही वो मेरे ; मेरे रक़ीबों को बड़े ,
प्यार से पास अपने ख़ुश हक़ से बुला के होते हैं ॥ 4 ॥
मैं तो जल उठता हूँ तब क़ागज़ सा जब अपना मुझे ,
हाथ मर्ज़ी से वो ख़ुश आपना छुला के होते हैं ॥ 5 ॥
अपने पत्थर के पहाड़ों को हमेशा ही बड़े ,
ख़ुश मेरे सर पे वो रख-रख कर ढुला के होते हैं ॥ 6 ॥
ख़ुद को सोने के हमेशा बाँट रखकर औ मुझे ,
बाँझ मिट्टी के डलों से ख़ुश तुला के होते हैं ॥ 7 ॥
मेरी नींदों के लिए वो जागते हैं तब कहीं ,
ख़ुश मुझे सब रात लोरी गा सुला के होते हैं ॥ 8 ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, March 19, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 870 - दाँतों को पीस



दाँतों को पीस , मुट्ठियों को कस ख़ुदा क़सम ॥
खा-खा के एक दो न बल्कि दस ख़ुदा क़सम ॥
इक दौर था पसीना मेरा ग़ुस्से में भी तुम ,
इत्रे गुलाब बोलते थे बस ख़ुदा क़सम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, March 17, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 869 - लो सप्त रंग



लो सप्त रंग घोल–घोल साथ ले जाओ ॥
कलंकहीनों के सँग होली खेलकर आओ ॥
रँगे सियारों को रँगने में रँग न ख़र्च करो ,
न रँग बदलते हुए गिरगिटों से रँगवाओ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, March 16, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 868 - किसी का मौन



किसी की चीख़ और ना फिर 
किसी का मौन रोकेगा ॥
न हिन्दू सिक्ख ईसाई 
न जैन औ जौन रोकेगा ॥
जब ऊग आएँगे मेरी पीठ 
पर दो पंख उड़ने को ,
मुझे छूने से फिर आकाश
 बोलो कौन रोकेगा ॥
( जौन = यवन या मुसलमान )
डॉ. हीरालाल प्रजापति


Wednesday, March 15, 2017

*मुक्त-मुक्तक : 867 - दर खुला पिंजरे का रख



मुझसे बंदर को कहे कूदूँ न मैं , उछलूँ न मैं !
दर खुला पिंजरे का रख बोले कभी निकलूँ न मैं !
बर्फ़ हूँ यह जानकर दुश्मन मेरा मुझको पकड़ ,
धूप में रखकर ये कहता है मुझे पिघलूँ न मैं !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, March 13, 2017

होली मुक्तक : मुझे चुमकार होली में ॥



रहूँगा मैं नहीं तैयार खाने मार होली में ॥
लगा फटकार निसदिन पर मुझे चुमकार होली में ॥
तू मुझसे दूर रहले साल भर भी मत मुझे तक तू ,
लगा कस – कस गले मुझको मगर हर बार होली में ॥
न जाने क्या हुआ मुझको अरे इस बार होली में ?
मैं चंगा था यकायक पड़ गया बीमार होली में ॥
हसीना इक मैं जैसी चाहता था सामने आकर ,
लगी करने जो मेरा एकटक दीदार होली में ।
हमेशा ही रहा करता हूँ मैं तैयार होली में ॥
अगर चाहे तो तू तेरी क़सम इस बार होली में ॥
बहुत लंबी , बहुत चौड़ी , बहुत ऊँची गिरा दे वो –
हमारे दरमियाँ है जो खड़ी दीवार होली में ॥
भले काँटों का ही पहना तू लेकिन हार होली में ॥
दिखावे को ही कर लेकिन फ़क़त कर प्यार होली में ॥
शराबों के नशे कितनी पियूँ चढ़कर उतर जाते ,
मुझे अपनी निगाहों की पिलादे यार होली में ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, March 12, 2017

मुक्त-ग़ज़ल : 230 - पूछना तुम तीन होली में ॥



उसका मन इस बार हम बन दीन होली में
दान ले लेंगे या लेंगे छीन होली में
श्वेत हों या श्याम हों ; कितने भी हों बेरंग ,
करके रख देंगे उन्हे रंगीन होली में
जिनको गुब्बारा फुलाने में भी हो पीड़ा ,
उनसे बजवाएंगे नचने बीन होली में
उस हृदय की पीठिका में है शपथ हमको ,
होके दिखलाएंगे कल आसीन होली में
हारते आए जो कल तक देखना तुम कल ,
जीत का फहराएँगे हम चीन होली में
कब किसी रंगोत्सव में हम तनिक रत हों ,
पर रहें सच सर्वथा लवलीन होली में
हम उन्हे रँगकर रहेंगे चाहे वो आएँ ,
सूट पहने या महज कोपीन होली में
कोई प्रश्न हमसे करे चिढ़ जाते हैं हम पर ,
एक दो क्या पूछना तुम तीन होली में ॥
( चीन = झण्डा ,  कोपीन = लँगोट )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति