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Monday, September 26, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 861 - किसी उँगली से अपनी


खड़े हो , बैठ उकड़ूँ या कि औंधे लेट ; पर लिखना ॥
लिखे को काट कर या उसको पूरा मेट कर लिखना ॥
किसी उँगली से अपनी नाम मेरा तुम ज़रूर इक दिन ;
मेरे चेहरे पे , सीनो पुश्त पे जी – पेट भर लिखना ॥
( पर = परंतु , सीनो पुश्त = छाती और पीठ , जी = तबीअत )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, September 24, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 860 - हैं भूखे हम बहुत

नहीं ख़स्ता कचौड़ी के , नहीं तीखे समोसे के ॥
नहीं तालिब हैं हम इमली न ख़्वाहिशमंद डोसे के ॥
न लड्डू , पेड़ा , रसगुल्ला ; न रबड़ी के तमन्नाई ;
हैं भूखे हम बहुत लेकिन तुम्हारे एक बोसे के ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, September 18, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 859 - दुश्मन की है तारीफ़

मेरी हर तक्लीफ़ हर मुश्किल का यारों यक-ब-यक _
उसने मेरे सामने हल चुटकियों में धर दिया ॥
आज उस दुश्मन की है तारीफ़ का मंशा बहुत ,
काम जिसने आज जानी दोस्त वाला कर दिया ॥
थी बहुत जिददो जहद थी कशमकश मैं क्या करूँ ?
सोचता रहता था बस ; फाँसी चढ़ूँ या कट मरूँ ?
जानता था ख़ुदकुशी करना है मुझको इसलिए ;
उसने आकर मेरे मुँह में जह्र लाकर भर दिया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, September 14, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 216 - काश कोई कमाल हो जाए ॥

काश कोई कमाल हो जाए ॥
अम्न दिल में बहाल हो जाए ॥
गर वो सबके जवाब देता है ;
एक मेरा सवाल हो जाए ॥
जब नहीं खोदने को कुछ होता ;
नख ही मेरा कुदाल हो जाए ॥
कम से कम ग़म में वाइज़ों को भी ;
बादानोशी हलाल हो जाए ॥
ख़ुद को भी वो मिटा के रख दे गर ;
सिर्फ़ ग़ुस्से से लाल हो जाए ॥
उसके जाते ही एक बिन माँ के ;
मेरा बच्चे सा हाल हो जाए ॥
ज़ोरावर हैं वो कछुए जो सोचें ;
उनकी चीते सी चाल हो जाए ॥
इक कमाल इस तरह भी हो मेरा ;
तीर ही मेरी ढाल हो जाए ॥
है ये हसरत तमाम बोसों की ;
उनको तू होंठ-गाल हो जाए ॥
इस तरह से मरूँ कि दुनिया में ;
मेरा मरना मिसाल हो जाए ॥
अपने कुछ सोचते हैं अपनों का ;
कैसे जीना मुहाल हो जाए ॥
बच भी सकता है वो अगर उसकी ;
प्यार से देखभाल हो जाए ॥
झूल लेना तुम उसपे जी भर कर ;
जब वो टहनी से डाल हो जाए ॥
ठण्ड में कड़कड़ाती वो मेरा ;
आर्ज़ू है कि शाल हो जाए ॥
( वाइज़ों = धर्मोपदेशकों ,बादानोशी = शराबखोरी ज़ोरावर = बलवान , बोसों = चुम्मों आर्ज़ू = इच्छा )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Sunday, September 11, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 215 - दे सका ना खिलौने

दे सका ना खिलौने रे बच्चों को मैं ॥
अपने नन्हें खिलौनों से बच्चों को मैं ॥
चाहता था कि दूँ चाँद – तारे उन्हें ,
हाय ! बस दे सका ढेले बच्चों को मैं ॥
माँगते थे वो रोटी तो देता रहा ,
मन के लड्डू सदा भूखे बच्चों को मैं ॥
पीटता था बुरों को कोई ग़म नहीं ,
डाँटता क्यों रहा अच्छे बच्चों को मैं ?
सोचता था कि बच्चे हरिश्चन्द्र हों ,
मानता सच रहा झूठे बच्चों को मैं ॥
इक पिता था समझता रहा फूल ही ,
धुर नुकीले , कड़े , पैने बच्चों को मैं ॥
रो दिया देखकर पेट को पालने ,
ईंट – गारे को सर ढोते बच्चों को मैं ॥
घर चलाते हैं बचपन से ही बन बड़े ,
बाप बोला करूँ ऐसे बच्चों को मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, September 10, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 214 - हैं अभी दीपक

हैं अभी दीपक ; कभी तो आफ़्ताब होंगे ॥
गर नहीं हम आज तो कल कामयाब होंगे ॥
दुरदुराओ मत हमें काग़ज़ के फूलों सा ;
देखना इक दिन हमीं अर्क़े गुलाब होंगे ॥
आज तक तो आबे ज़मज़म हैं मगर शायद ;
आपकी सुह्बत में हम कल तक शराब होंगे ॥
आज हम फाँकें चने तो तश्तरी में कल ;
क्या ज़रूरी है  नहीं शामी कबाब होंगे ?
भेड़िये जो खोल में रहते हैं गायों के ;
इक न इक दिन देखना ख़ुद बेनक़ाब ॥
आज कोई भी नहीं फ़न का हमारे पर ;
एक दिन मद्दाह सब आली जनाब होंगे ॥
 ( आफ़्ताब=सूर्य / दुरदुराना=उपेक्षा करना / आबे ज़मज़म=पवित्र जल / सुह्बत=संगति / मद्दाह=प्रशंसक )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, September 8, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 858 - मारते हैं वो ॥

कभी यूँ ही कभी ग़ुस्से में भरकर मारते हैं वो ॥
मगर तय है कि आते-जाते अक्सर मारते हैं वो ॥
झपटकर,छीनकर,कसकर,जकड़कर अपने हाथों से  ;
मेरे शीशा-ए-दिल पे खेंच पत्थर मारते हैं वो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, September 4, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 213 - झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ?

इश्क़ किया करने वाले ग़म ही पाते हैं लोग ॥ 
जानूँ न क्यों झूठी अफ़वाहें फैलाते हैं लोग ?
मैं तो मोहब्बत में ग़म खाकर भी चुप रहता मस्त ;
दोस्त मज़े चख-चख कर भी क्यों चिल्लाते हैं लोग ?
जह्र था उसमें जो खा बैठे सुनकर कितने हाय ;
मान के सच , सचमुच दहशत में मर जाते हैं लोग ॥
कुछ तो रखा करते ममियों का भी ज़िंदों सा ख़याल ;
और कई जीते जी ज़िंदे मरवाते हैं लोग ॥
मैं तो सहारा ले तिनकों का भी आ बैठूँ पार ;
जानूँ न कैसे कश्ती थामें बह जाते हैं लोग ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, September 3, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 857 - सड़कों पे दौड़े मछली

सड़कों पे दौड़े मछली कब ख़्वाहिश की मैंने ?
उड़ने की कब हाथी से फ़र्माइश की मैंने ?
लेकिन तेरी ख़ातिर मैं जो फूल न तोड़ सकूँ ;
तारे तोड़ के लाने की हर कोशिश की मैंने ॥
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, September 1, 2016

*मुक्त ग़ज़ल : 212 - ज़िंदगी इतनी जल रही होगी ॥

ज़िंदगी इतनी जल रही होगी ॥
मौत सिल सी भी गल रही होगी ॥
वो उसे दे रहा दग़ा होगा ,
वो उसे कसके छल रही होगी ॥
रेंग अब भी वो चुप रहा होगा ,
चीख़-चिल्ला वो चल रही होगी ॥
बढ़ रहा होगा कोई महलों में ,
कोई कुटिया में पल रही होगी ॥
अपने साँचे में मुझको गढ़ फिर वो ,
मेरे साँचे में ढल रही होगी ॥
देखकर आज वो जो शर्मायी ,
मेरी महबूबा कल रही होगी ॥
जिसको वह गीत जैसा गाता था ,
वह ज़रूर इक ग़ज़ल रही होगी ॥
रेगमालों पे दौड़ने वाली ,
काई पे चल फिसल रही होगी ॥
भर बुढ़ापे में उसकी छाती पर ,
ज़िंदगी मूँग दल रही होगी ॥
मारके मुझको देखना जाकर ,
हाथ अपने वो मल रही होगी ॥
अपने बच्चों को ख़ुद उबलती माँ ,
पंखा गर्मी में झल रही होगी ॥
पूछता था वो क्यों सवाल उससे ,
शायद उसका वो हल रही होगी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति