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Tuesday, August 23, 2016

*मुक्त ग़ज़ल : 211 : बेवफ़ा कलमुँहा ,मुँहजला इश्क़ है ॥

बेवफ़ा कलमुँहा , मुँहजला इश्क़ है ॥
किसने तुझसे कहा इक बला इश्क़ है ?1॥ 
हैं अगर कोई तो ; वो हैं आशिक़ बुरे ,
इश्क़ को मत बुरा कह ; भला इश्क़ है ॥2॥ 
है सुपाड़ी के जैसा कभी तो कभी ,
इक पके आम सा पिलपिला इश्क़ है ॥3॥ 
है मुंहासा कभी चाँद पे दाग़ सा ,
तो कभी तलवे का आबला इश्क़ है ॥4॥ 
आये अपनी पे जब सूर्य पर नाँ जले ,
नाँ हिमालय पे चढ़के गला इश्क़ है ॥5॥ 
है कभी बस ज़ुबाँ पे थिरकता हुआ ,
कभी दिल ही दिल में पला इश्क़ है ॥6॥ 
है कभी एक लू का थपेड़ा कभी ,
बाद गर्मी के पहला झला इश्क़ है ॥7॥ 
हुस्न के दर पे धरना दे बैठा हुआ ,
टालने से कभी नाँ टला इश्क़ है ॥8॥ 
है कभी ख़ुद के हाथों तराशा हुआ ,
कभी एक साँचा ढला इश्क़ है ॥9॥ 
नाँ कभी शाहराहों न गलियों पे बस ,
अपनी मंज़िल की रह पे चला इश्क़ है ॥10॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, August 20, 2016

*मुक्त ग़ज़ल : 210 - सवाल इक पूछना है

सफ़र कर आ रहे हैं जो समंदर का महीनों से ;
किनारे आ के भी उतरें न अब वो ही सफ़ीनों से ॥
यक़ायक़ क्या हुआ जिनके लगे रहते थे पीछे ही ;
छुड़ाते दिख रहे पीछा वही अब उन हसीनों से ॥
हुए वो दिन हवा जब बाज सी नज़रें वो रखते थे ;
उन्हें दिखता नहीं अब पास का भी दूरबीनों से ॥
कि जो गुमनाम होते हैं क्या वो इंसाँ नहीं होते ?
सवाल इक पूछना है मुझको सारे नामचीनों से ॥
मोहब्बत से चले थे पालने नागों को बाँहों में ;
फ़क़त दो दिन में डस मारा मुओं ने आस्तीनों से ॥
मोहब्बत के बराबर वज़्न कोई भी नहीं होता ;
न दौलत से , न सीमोज़र न ये तुलती नगीनों से ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, August 14, 2016

स्वतन्त्रता दिवस

स्वतन्त्रता दिवस के

रंगारंग कार्यक्रमों के उपरांत
कागज़ अथवा पन्नी
के छोटे-छोटे

तिरंगों को
यहाँ वहाँ फेंककर
हिंदुस्तान के सम्मान

को न कुचलें ।
- डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, August 13, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 209 - तूने जिसे कहा था

तूने जिसे कहा था आब ; आब ही सुना ॥
मैंने न उसको जह्र या शराब ही सुना ॥
तूने जिसे कहा था सच नहीं है ये , कभी
मैंने भी उसको दिन का एक ख़्वाब ही सुना ॥
तूने जिसे कहा था मुझको पढ़ने ग़ौर से ;
मैंने भी उसको आँख कब ? किताब ही सुना ॥
हिन्दी में तूने मुझको चाँद चाँद जब कहा ;
उर्दू में मैंने उसको माहताब ही सुना ॥
इंसाफ़ के लिए जो तूने रास्ता कहा ;
मैंने भी उसका नाम इन्क़लाब ही सुना ॥
तूने अदब से भी न जब पुकारा तब भी सच ;
मैंने उसे हुज़ूर या जनाब ही सुना ॥
( आब = पानी ,जह्र = विष , माहताब = चाँद , इन्क़लाब = क्रांति , हुज़ूर या जनाब = एक आदर युक्त सम्बोधन  )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, August 10, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 856 - माथे धर वंदन होता ॥

प्रातः के पश्चात सांध्य भी माथे धर वंदन होता ॥
तुलसी की मानस का घर-घर में सस्वर वाचन होता ॥
पढ़कर मनोरंजन ना कर यदि हृदयंगम सब करते तो ,
मर्यादाओं का जग में सच क्योंकर उल्लंघन होता ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, August 7, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 208 : दिल चुरा के फ़रार होते हैं ॥

खूबसूरत जो यार होते हैं ;
दिल चुरा के फ़रार होते हैं 1॥ 
तीर चल जाएँ फिर कहाँ रुकते ,
आर होते या पार होते हैं 2॥ 
हमपे होते नहीं जो क़ुर्बां हम ,
उनपे अक्सर निसार होते हैं 3॥ 
रातें होती हैं सच वहाँ दिन सी ,
और शब से नहार होते हैं4॥ 
सच में होते हैं वो जो ताक़तवर ,
मुँह के वो ख़ाकसार होते हैं 5॥ 
उन से होते हैं लोग गिनती के ,
अपने जैसे हज़ार होते हैं 6॥ 
शक्लो सूरत के ताज सच पूछो ,
दिल में कच्ची मज़ार होते हैं 7॥ 
कोई बतलाए कैसे रातों रात ,
बैलगाड़ी से कार होते हैं ?8॥ 
होने को क्या न होवे दुनिया में ,
गाय के सिंह शिकार होते हैं ?9॥ 
उन पे क्या एतबार पापड़ से ,
जिनके क़समो क़रार होते हैं ?10॥ 
वो भी चलते हैं रुक नहीं जाते ,
जिनकी राहों में ख़ार होते हैं 11॥ 
हुस्न पे उनके इक दफ़ा न फ़िदा ,
सब के दिल सौ सौ बार होते हैं12॥ 
झोपड़ी से भी तोहफ़े उनके ,
ताज से यादगार होते हैं13॥ 
साथ उनके खजाँ के मौसम भी ,
सच में फ़स्ले बहार होते हैं14॥ 
उनकी ठोकर से मीठे दर्या भी ,
सूखकर रेगज़ार होते हैं 15॥ 
( शब = रात , नहार = दिन , ख़ाकसार = विनम्र , ख़ार = काँटा , खजाँ = पतझड़ , रेगज़ार = मरुस्थल )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, August 6, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 855 - मीठी झील तक गए ॥

कब अपने शहर की ही मीठी झील तक गए ॥
दो - चार - छः नहीं हजारों मील तक गए ॥
प्यासे थे इस क़दर कि सब कुएँ , तलाव पी ;
गंगो–जमन , चनाब , मिश्र – नील तक गए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, August 4, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 207 : मंदिर नहीं मिला ॥

बाहर से कोई ढूँढे भी काफ़िर नहीं मिला ॥
अंदर किसी के एक भी मंदिर नहीं मिला ॥
पर्वत सा मत हिलो जो मुझे कह रहा था कल ,
आँधी में वो भी झण्डे सा स्थिर नहीं मिला ॥
हों हाथ , पैर , सीना औ गर्दन सुराही सी ,
किस काम की वो देह जिसे सिर नहीं मिला ?
आग़ाज़ हस्बे मर्ज़ी न पाया ये ख़ैर थी ,
अफ़्सोस क्यों पसंद का आख़िर नहीं मिला ?
इंसानियत से था वो लबालब ख़ुदा क़सम ,
शैतान उसके जैसा कहीं फिर मिला नहीं ॥
( काफ़िर = किसी को न मानने वाला ।  आग़ाज़ = प्रारम्भ, जन्म । हस्बे मर्ज़ी = मनोवांछित । आख़िर = अंत , मृत्यु )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, August 3, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 854 - इक आदमी लोहे का


टूटा न जो चाबुक की दमादम सड़ाक से ॥
टूटा न जो बिजली की भयंकर कड़ाक से ॥
इक आदमी लोहे का तेरी खा के गालियाँ ,
मानिंदे बुते शीशा वो टूटा तड़ाक से ॥
( दमादम = निरंतर , मानिंदे बुते शीशा = काँच के पुतले जैसा )

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, August 2, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 853 - तड़पूँ तुम्हारे वास्ते


तड़पूँ तुम्हारे वास्ते , न आह अब भरूँ ॥
हूँ तो निसार अब भी पर न पहले सा मरूँ ॥
विस्मृत नहीं किया है किन्तु ये भी सत्य है ,
अब नाम का तुम्हारे जाप मैं नहीं करूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति