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Wednesday, June 29, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 200 - बना बना के बिगाड़ा




लगा के बाग़ उजाड़ा , ये बात ठीक न की ॥
बना बना के बिगाड़ा , ये बात ठीक न की ॥
जगाने मुझको तू आया तो बाँग देता मगर ,
तू कान में ही दहाड़ा , ये बात ठीक न की ॥
पड़ा ही रहने दिया होता था मैं खंभा अगर ,
गड़ा के फिर से उखाड़ा , ये बात ठीक न की ॥
अदू जो मुझको गिराते तो सच न होती कसक ,
सगे सगों ने पछाड़ा , ये बात ठीक न की ॥
ख़ता पे मुझको बुज़ुर्गों ने डांट ठीक किया ,
जो बच्चों ने भी लताड़ा , ये बात ठीक न की ॥
बग़ैर मेरे बुलाए फटे में ये क्या किया ?
अड़ा के टाँग कबाड़ा , ये बात ठीक न की ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, June 28, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 199 - अपना सा बनाने वाले ॥




मुस्कुराहट को ठहाका सा बनाने वाले ॥
दरिया भर दर्द वो क़तरा सा बनाने वाले ॥
एक हम हैं जो रखें गुड़ भी बनाके गोबर ,
और लोहे को वो सोना सा बनाने वाले ॥
हमने बाग़ों से कली-फूल जो तोड़े-फेंके ,
उनको चुन-चुन के वो गजरा सा बनाने वाले ॥
सिर्फ़ रोतों को हँसाने के बड़े मक़सद से ,
ग़म का क़िस्सा वो लतीफ़ा सा बनाने वाले ॥
हमसे अपने भी गए तोड़ के रिश्ता-नाता ,
दुश्मनों को भी वो अपना सा बनाने वाले ॥
हमने बचपन को सरेआम बनाया बूढ़ा ,
वो बड़े-बूढ़ों को बच्चा सा बनाने वाले ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Monday, June 27, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 198 - तबले की तिरकिट-धा-धिन है ॥


चाँदी रात है , सोना दिन है ॥
दिल फिर भी नाख़ुश लेकिन है ॥
तेरे बिन जीना नामुमकिन ,
फिर भी जीना तेरे बिन है ॥
उससे क्या माँगें जो दाने ,
ना तोले देता गिन-गिन है ॥
कैसे चूमें-चाटें उसको ,
हमको आती जिससे घिन है ॥
बस पागल ही इस दुनिया में ,
दर्द में भी हँसता तासिन है ॥
मेरा पीछा वो मीठे पर ,
मक्खी सा करता भिन-भिन है ॥
मैं वीणा का पंचम स्वर वो ,
तबले की तिरकिट-धा-धिन है ॥
तन नाजुक है फूल सा उसका ,
पत्थर सा लेकिन बातिन है ॥
मैं तो बस बोगी ही बोगी ,
क़िस्मत ही मेरा इंजिन है ॥
( तासिन = जीवन पर्यंत , बातिन = मन , हृदय )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, June 26, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 197 - अच्छा नहीं किया हमने ॥



ना दवा ,दारू न जहराब ही पिया हमने ॥
ज़ख्म बढ़ता रहा फिर भी नहीं सिया हमने ॥
इतने भूखे रहे इतने कि जब मिला पानी ,
हमने रोटी सा चबाया नहीं पिया हमने ॥
उसने वो बेच डाला अपने फ़ायदे भर को ,
बेचकर ख़ुद को जो तोहफ़ा उसे दिया हमने ॥
फ़ौज में आए हैं बस रोज़गार की ख़ातिर ,
ठेका मरने का वतन पे नहीं लिया हमने ॥
कल जो हमने किया था एक काम अच्छा ही ,
आज लगता है वो अच्छा नहीं किया हमने ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Friday, June 24, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 196 - धोबी-पछाड़ बन बैठे ॥


तेरी चाहत में यार तिल से ताड़ बन बैठे ॥
एक पौधे से भीमकाय झाड़ बन बैठे ॥
ईंट पत्थर की थी दीवार ऊँची-मोटी बस ,
तेरे आने से खिड़की औ किवाड़ बन बैठे ॥
चिड़चिड़ाहट के बुत थे , थे बहुत ही गुस्सेवर ,
तूने चाहा तो धीरे-धीरे लाड़ बन बैठे ॥
तुझको छुप-छुप दरार में से झाँकने वाले ,
आज तेरी अपारदर्शी आड़ बन बैठे ॥
ख़ुद की जीते जी जो जुगत न बन सके तेरी ,
तेरे मक़सद पे हो क़ुबाँ जुगाड़ बन बैठे ॥
बस मोहब्बत की कुश्तियों में सब रक़ीबों को ,
करके चित छोड़े वो धोबी-पछाड़ बन बैठे ॥
दुश्मनों को तेरे जलाने-भूनने को हम ,
गाह तंदूर कभी एक भाड़ बन बैठे ॥
( बुत = प्रतिमा , गुस्सेवर = क्रोधी , रक़ीबों = अपनी प्रेमिका के प्रेमी , गाह = कभी , भाड़ = अनाज भूनने की भट्टी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Wednesday, June 22, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 195 - छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥


शत्रु हो बैठे मीत की बातें ॥
छोड़ दो अब अतीत की बातें ॥
दुःख भरे राग छेड़ना छोड़ो ,
बस करो हर्ष-गीत की बातें ॥
हार को भूलभालकर पिछली ,
सोचो अब अगली जीत की बातें ॥
बैरियों से रखो तुम अनबोला ,
अपनों से कीजै प्रीत की बातें ॥
जो नहीं लाभप्रद न अच्छी ही ,
मत निभाओ वो रीत की बातें ॥
कंपकंपातों को आँच-धूप वरो ,
मत करो बर्फ-शीत की बातें ॥
नित्य मल-भक्षकों से मत करना ,
गंगा-जमुना पुनीत की बातें ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Monday, June 20, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 194 - ‘गब्बर’ सा हो गया ॥



फूलों सा मैं यकायक नश्तर सा हो गया ॥
थपकी से एक थप्पड़-ठोकर सा हो गया ॥
माना मैं मोम था कल , मक्खन सा नर्म था ,
कुछ हो गया कि अब मैं पत्थर सा हो गया ॥
शोले का सच में था मैं ठाकुर सा क्या कहूँ ?
शोले का आजकल मैं गब्बर सा हो गया ॥
पहले नहीं थी उसकी आँखों में भी जगह ,
अब दिल-दिमाग़ में भी इक घर सा हो गया ॥
वो मुझसे यों कटे बस लगता है मुझको ये ,
जैसे कोई परिंदा बेपर सा हो गया ॥
रगड़ा गया है मुझको इतना कि खुरदुरे ,
इक रेगमाल से मैं मर्मर सा हो गया ॥
भूकंप इतने झेले मेरे मकान ने ,
है तो नया ही लेकिन जर्जर सा हो गया ॥
पहले नहीं थी इसमें मूरत कोई मगर ,
मस्जिद सा मेरा दिल अब मंदिर सा हो गया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, June 18, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 847 - हमने क्या देखा ?




फ़क़त एक हमने क्या देखा सभी ने ॥
तुम्हें नाखुदा बन डुबोते सफ़ीने ॥
तो ये जान क्यों कोई चाहेगा तुमको,
हो जब इस क़दर धोखेबाज़ और कमीने ॥
(फ़क़त = केवल ,नाखुदा = नाविक ,सफ़ीने = नाव ,कमीने = पातकी )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Friday, June 17, 2016

अतिथि विद्वानों की दशा


मध्यप्रदेश में वर्षों से शासकीय महाविद्यालयों में कार्यरत अतिथि विद्वानों की दशा का यथार्थ चित्र ! 

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-ग़ज़ल : 193 - खूबसूरत हम थे जब ॥



हमने इक ग़म क्या किया उनसे तलब ॥
छीन लीं उनने हमारी खुशियाँ सब ॥
चाहते थे वो चकोरे सा हमें ,
चाँद जैसे खूबसूरत हम थे जब ॥
कल लगे थे दुम सरीखे पीछे वो ,
इक गधे के सींग से ग़ायब हैं अब ?
वो ये कहते हैं किया कब याद हमें ,
हम ये कहते हैं कि भूले ही थे कब ?
उनपे कर बैठे थे दिल-ओ-जाँ निसार ,
थी कहाँ हममें समझ ? छोटे थे तब ॥
उनकी आँखें तो ज़ुबाँ से थीं बड़ी ,
क्या हुआ गर बंद रखते थे वो लब ?
दिल था सोना , रूह कोहेनूर थी ,
काश होता पुरकशिश तन का भी ढब !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति