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Sunday, February 28, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 811 - दाँव पर लगाया है ॥




पैर नीचे की जमीं भर को पूरा का पूरा ,
सर की छत आस्माँ को दाँव पर लगाया है ॥
ज़िंदा रहने को लोग क्या नहीं किया करते ?
हमने मरने को जाँ को दाँव पर लगाया है ॥
ठीक है ये या ग़लत ये तो रब ही जाने मगर
इतना अहसास है कि हमने अपनी मंज़िल को ,
दाँव पे ख़ुद को तो लगाया ही लगाया सँग –
बेगुनह कारवाँ को दाँव पर लगाया है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, February 21, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 810 - किसकी है वह ?



मूर्ति मन मंदिर में मेरे माप की बैठी रही ॥
चाहता था जैसा मैं उस नाप की बैठी रही ॥
पूछते हो किसकी है वह ? और किसकी हो सके ?
आप की बस आप की बस आप की बैठी रही ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


*मुक्त-मुक्तक : 809 - उकड़ूँ बैठकर ॥



बिन कोई बल खाये या रस्सी के जैसा ऐंठकर ॥
हाँ खड़े रहकर , पड़े रहकर या उकड़ूँ बैठकर ॥
है बड़ा तू तो रहे , मैं क्या करूँ ऐ पत्रकार ?
सर्वथा मेरे निजी जीवन में मत घुसपैठकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Tuesday, February 16, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 808 - धूल - मिट्टी की जगह......




धूल - मिट्टी की जगह सीम या ज़र हो जाता ॥
तुच्छ झींगे से मगरमच्छ ज़बर हो जाता ॥
ख़ुद को महसूस हमेशा ही तो नाचीज़ किया ,
अपने कुछ होने का अहसास अगर हो जाता ॥
( सीम या ज़र = सोना या चाँदी , ज़बर = शक्तिशाली )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति


Friday, February 12, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 807 - दो बूँद जल दे दे ॥




लगाते दौड़ चूहे पेट में 
बस एक फल दे दे ॥
न दे खाने को पीने के लिए
 दो बूँद जल दे दे ॥
अशक्त होकर पड़ा हूँ भूमि पे यों
 जैसे कोई शव ,
न कर कुछ मुझको उठ भर जाऊँ
 तू बस इतना बल दे दे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति



Wednesday, February 10, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 806 - शराफ़त का लिबास



हमने जैसे ही पहना नेकी-शराफ़त का लिबास ,
दुनिया बदमाशियों पे हो गई उतारू सब ॥
हमने ज्यों ही उतारा मैक़शी के दामन को ,
लोग पीने लगे बग़ैर प्यास दारू सब ॥
उनको कहते हैं लोग शहर का बड़ा नेता -
सिर पे टोपी लपेटते गले में वो मफ़लर ,
हम जो दफ़्तर में सैंडल पहन के क्या पहुँचे ,
उसको कहने लगे फटाक से गँवारू सब !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Sunday, February 7, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 805 - मेरे घर अब नहीं आते ॥


बुलाए बिन चले आते थे वो पर अब नहीं आते ॥
निमंत्रण भेजने पर भी मेरे घर अब नहीं आते ॥
मैं पहले की तरह दाने बिखेरे रोज़ बैठूँ पर ,
न जाने क्यों मेरी छत पर कबूतर अब नहीं आते ?

-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Saturday, February 6, 2016

*मुक्त-मुक्तक : 804 - तू मिसरी कर दे ॥



जलेबियों को सरल रेख सी सीधी कर दे ॥
करेलों-नीमों-मिर्चियों को तू मिसरी कर दे ॥
नहीं है मुझमें कुछ ऐसा जो भाए दुनिया को ,
मेरी चुड़ैल सी ये ज़िंदगी परी कर दे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

Thursday, February 4, 2016

*मुक्तक-मुक्तक : 803 - आज मिर्च से पिसते ?



नर्म चिकनाई को पैरों से रौंदने वाले ,
आज अपने कपोल रेग्माल पर घिसते ॥
तोड़ते - फोड़ते सबको जो हथौड़े , कैसे
वक़्त की चक्कियों में आज मिर्च से पिसते ?
बहतीं कल-कल ठुमकती चलतीं स्वच्छ नदियों पर ,
जो बनाते थे ऊँचे - ऊँचे बाँध पर्वत से ,
आज अपने ही मरुस्थल , प्रगाढ़ दलदल में
धँसके आँखों से लगातार लहू से रिसते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति