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Wednesday, December 28, 2016

*मुक्त-ग़ज़ल : 221 - तुझमें ज़िद आर्ज़ू की



उम्र ढलती है मेरी तो ढलती रहे ॥
हाँ जवानी तुम्हारी  सम्हलती रहे ॥
अपनी सब हसरतें मैं मनालूँ अगर ,
तुझमें ज़िद आर्ज़ू की मचलती रहे ॥
मौत जब तक न आए फ़क़त ज़िंदगी ,
पाँव बिन भी ग़ज़ब तेज़ चलती रहे ॥
सेंक ले अपनी रोटी तू बेशक़ मगर ,
दाल मेरी भी यों कर कि गलती रहे ॥
भैंस होगी न गोरी भले रात-दिन ,
गोरेपन की सभी क्रीम मलती रहे ॥
आदतन आँख पीरी में भी इश्क़ की ,
हुस्न की चिकनी तह पर फिसलती रहे
इश्क़ की आग इक बार लग जाए फिर ,
गहरे पानी में भी धू-धू जलती रहे ॥
तू मिले न मिले दिल में हसरत मगर ,
चाहता हूँ तेरी मुझमें पलती रहे
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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