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Sunday, April 10, 2016

गीत : 42 - क्या किसी भूले हुए.....

क्या किसी भूले हुए ग़म की याद आने लगी ?
हँसते - हँसते हुए क्यूँ आँख छलछलाने लगी ?
क्या किसी भूले हुए..........................
आँख कस - कस के भी लगाए लग न पाती है ।
रात करवट बदल - बदल के बीत जाती है ।
लोग खो जाते हैं सपनों में झपकते ही पलक ।
हमको क्यूँ नींद भी इक ख़्वाब नज़र आती है ?
मुश्किलों से ही हुआ था अभी आराम नसीब ,
कोई तक्लीफ़ तभी फ़िर से सिर उठाने लगी ॥
क्या किसी भूले हुए..........................
हमको तपने का नहीं शौक़ फ़िर भी तपते हैं ।
धूप अप्रेल - मई दोपहर की सहते हैं ।
हमको शोलों से मुलाक़ात की कब चाह रहे ?
होके मज़्बूर ही सूरज से हम लिपटते हैं ।
आज मौक़ा जो मिला चाँद को छूने का हमें ,
चाँदनी उसकी मैं हैराँ हूँ क्यूँ जलाने लगी ?
क्या किसी भूले हुए..........................
हँसते - हँसते हुए..............................

-डॉ. हीरालाल प्रजापति
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