Pages - Menu

Disclamer

All posts are covered under copyright law . Any one who wants to use the content should take permission the author before reproducing the post in full or part in blog medium or print medium by any other way.Indian Copyright Rules

Thursday, April 14, 2016

185 : ग़ज़ल - खलबली

आज उसकी ही बात लग गई बुरी हमको ॥
जिसकी बातें थीं बुरी से बुरी भली हमको ॥
आज क्या हो गया कि कह रहा है ख़ार हमें ,
वह जो कहता था चुभन में भी बस कली हमको ?
आज कहता है वही हमको अद्ना मामूली ,
कल जो थकता न था कहते हुए वली हमको ॥
अपनी आमद से तो तूफाँ भी ठहर जाते हैं ,
उसने फिर किस बिना पे बोला खलबली हमको ?
भूल बैठा है वो सूरत भी हमारी औ यहाँ ,
याद रहती है उसके घर की हर गली हमको ॥
उनका दम घुट गया गुबार देखते ही यहाँ ,
गर्द में जी के भी खाँसी भी न चली हमको ॥
सबको तलकर खिलाईं उसने पूरियाँ मीठी ,
सख़्त मोटी और कच्ची रोटी अधजली हमको ॥
यों तो पहले भी कहते थे भला-बुरा लेकिन ,
आज गाली ही बक दी वो बहुत खली हमको ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति
Post a Comment