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Wednesday, November 25, 2015

नवगीत : 40 - अलाव नहीं है ॥




चाहे धरा पे चाहे चाँद पे या अधर पर ॥
जो चाहते हैं वह न लाके दोगे तुम अगर ॥
तुम लाख कहो तुमको हमसे प्यार है मगर ,
हम समझेंगे हमसे तुम्हें लगाव नहीं है ॥
सिंगारहीन हमको देखकर अगर तुम्हें –
ऐसा लगे न सामने है कोई अप्सरा ।
सजधज के आएँ तो लगे न दिल की धड़कनें –
थम सी गई हैं या तुरंत बढ़ गईं ज़रा ।
हम मान लेंगे हममें सुंदराई तो है पर ,
टुक चुम्बकत्व या तनिक खिंचाव नहीं है ॥
छू भर दें हम अगर तुम्हें तो तुमको न लगे –
बहने लगी नसों में ख़ून की जगह पे आग ।
धर दें अधर अधर पे फिर भी तुममें रंच भी –
जो सुप्त है कि मृत है वो जाए न काम जाग ।
समझेंगे अपना व्यर्थ है यौवन ये सरासर ,
ठंडा है दहकता हुआ अलाव नहीं है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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