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Friday, November 13, 2015

171 : मुक्त-ग़ज़ल - गोल चकरी ॥


तेरे आगे क्या मेरी औकात ठहरी  ?
राजधानी तू मैं इक क़स्बा या नगरी ॥
यों तो हूँ मैं जिराफ सा पर तेरे आगे ,
सामने ज्यों ऊँट के बैठी हो बकरी !!
तेरे मेरे रंग में बस फ़र्क़ इतना ,
एक काला काग दूजा मृग सुनहरी !!
तेरे चक्कर काटती फिरती है दुनिया ,
मैं हवा से फरफराती गोल चकरी ॥
मुझसे मत मरू की तृषा तू कह बुझाने ,
चुल्लू भर पानी मैं तू इक नदिया गहरी ॥
क्या तुझे ललकार कर मरना मुझे है  ?
तू पहलवान और मैं कृशकाय-ठठरी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

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