Pages - Menu

Disclamer

All posts are covered under copyright law . Any one who wants to use the content should take permission the author before reproducing the post in full or part in blog medium or print medium by any other way.Indian Copyright Rules

Saturday, March 7, 2015

नवगीत (30) - केवल क़द-काठी तक मेरा हृदय आँकते हो


पेड़ हरा औ भरा भी सूखी 
डाली सा लगता ॥
इक तू न हो तो सारा मेला 
खाली सा लगता ॥
तू जो चले सँग तो काँटों की 
चुभन भली लगती ।
तू जो साथ खाए तो नीम 
मिसरी की डली लगती ।
तुझ बिन अपनी ईद मुहर्रम
 जैसी होती है –
तू हो तो होलिका-दहन 
दीवाली सा लगता ॥
झर-झर बहती रहतीं , रहतीं 
तनिक नहीं सूखी ।
जब तेरे दर्शन को अँखियाँ 
हो जातीं भूखी ।
मुझको थाल सुनहरा लगने 
लगता है सूरज –
चाँद चमकती चाँदी वाली 
थाली सा लगता ॥
केवल क़द-काठी तक मेरा 
हृदय आँकते हो ।
रहन-सहन पहनावा भी तुम 
व्यर्थ झाँकते हो ।
मेरे तल तक पहुँचो फिर 
गहराई बतलाना –
नील-गगन से नद भी उथली 
नाली सा लगता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
Post a Comment