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Friday, March 6, 2015

नवगीत (29) - उसके साथ खेलकर होली.....


उसके साथ खेलकर होली
आज तृप्त मन को करना है ॥
जिसको बिन पूछे मैं अपना
श्वेत-धवल मन दे बैठा ।
और रँगा इतना उसके रँग
इंद्रधनुष ही बन बैठा ।
अपने सप्त रँगों से उसके
वर्ण-सिक्त मन को करना है ॥
मैं उसमें ऐसा ही फैलूँ
जैसी वह मुझमें व्यापे ।
या मैं उसको कर दूँ विस्मृत
या वह भी मुझको जापे ।
भूल एक पक्षीय कभी ना
प्रेम-क्षिप्त मन को करना है ॥
जिसकी याद हृदय में सावन-
जेठ हरी ही रहती है ।
नीले सागर सी जो मन में
सदा भरी ही रहती है ।
बूँद-बूँद उसकी उलीचकर
पूर्ण-रिक्त मन को करना है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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