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Thursday, February 19, 2015

नवगीत (27) - वह मेरे दिल के क़रीब है ॥


बेशक़ ! यह लगता अजीब है ॥
वह करता है अपने मन की ।
कुछ कहते हैं उसको सनकी ,
कुछ उसको धुर सिड़ी पुकारें –
वह मेरे दिल के क़रीब है ॥
नज़्म रईसाना सब उसकी ।
ग़ज़ल अमीराना सब उसकी ।
वह अदीब लिखता दौलत पर –
मगर निहायत ही ग़रीब है ॥
सारे ही हथियार पकड़ता ।
जान हथेली पर ले लड़ता ।
लेकिन जीत कभी ना पाता –
दुश्मन जो उसका नसीब है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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