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Monday, January 5, 2015

नवगीत (16) : इसलिए वह दिल में रहते ॥


इसलिए वह दिल में रहते ॥
रात-दिन याद उनकी आती ,
नद सरीखे अश्रु बहते ॥
सब बुरा ही कहते मुझको ।
गालियाँ ही बकते मुझको ।
इक वही दुनिया में हैं जो –
मुझको बस अच्छा ही कहते ॥
हर तरफ से कोंचती जब ।
मुझको दुनिया टोंचती जब ।
वो कवच और ढाल बनकर –
ख़ुद पे भाले-तीर सहते ॥
भीड़ मुझ पर से सम्हलती ।
रौंदती चलती कुचलती ।
वो फ़रिश्ता से उठाने –
आके मेरा हाथ गहते ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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