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Saturday, January 10, 2015

158:मुक्त-ग़ज़ल-मशहूर को जहां से गुमनाम बना डाला


मशहूर को जहां से गुमनाम बना डाला ॥
ऊगी सुबह को ढलती हुई शाम बना डाला ॥
मैकश असर तो तेरी सोहबत दिखा के मानी ,
मुझ मै-अदू को भी मै-आशाम बना डाला ॥
लतियाता न मुझे तू तो फल्ली-चना ही रहता ,
तेरी ठोकरों ने काजू-बादाम बना डाला ॥
पूनम की चाँदनी था ,बरगद की छाँव था मैं
तुमने भरी दुपहरी का घाम बना डाला ॥
हालात ने वो करवट बदली कि क्या बताएं ?
सीता के राम को राधेश्याम बना डाला ॥
( मैकश=शराबी ,मै-अदू=मदिरा-शत्रु ,मै-आशाम=मदिरा-प्रेमी ,घाम=धूप )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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