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Thursday, January 1, 2015

नवगीत (14) : व्यर्थ रहूँ उससे आकर्षित ॥


व्यर्थ रहूँ उससे आकर्षित ॥
जिसको पाना सूर्य पे जाना ।
भर बारिश में पतंग उड़ाना ।
जिसने मुझको स्वयं रखा है –
पाने से पहले आवर्जित ॥
क्यों सुंदर वह वज्र हृदय की ?
देखो लीला भाग्य समय की ।
जो मुझसे निर्लिप्त पूर्णतः –
मैं उसपे मन प्राण से अर्पित ॥
धन कुबेर वो रंक बड़ा मैं ।
मृदु उबटन वो पंक कड़ा मैं ।
मेल न मेरा उसका फिर भी –
मैं उससे मिलने उत्कंठित ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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