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Wednesday, December 31, 2014

पूर्ण सहर्ष करें मन से तेरा स्वागत नववर्ष ॥


पाताली-घनघोर पतन या गगनचुंबी उत्कर्ष
चाहे अपने सँग तू लाये शान्ति या कि संघर्ष
किन्तु सभी उत्थानाशान्वित-सुखाभिलाषी हम ,
पूर्ण सहर्ष करें मन से तेरा स्वागत नववर्ष

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, December 30, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 655 - सुंदरता को द्विगुणित करके......


सुंदरता को द्विगुणित करके अलंकरण से ॥
चलती जब वह हौले-हौले कमल चरण से ॥
मरता यदि सान्निध्य को उसके अति कायर भी ,
फिर उसको पाने वो डरता नहीं मरण से ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, December 29, 2014

नवगीत (13) : उस कोमल में अति दृढ़ता है ॥


उस कोमल में अति दृढ़ता है ॥
जीवन के प्रति इक उत्कटता ।
है उसमें अद्भुत जीवटता ।
नीलगगन के स्वप्न लिए वो -
बिन सीढ़ी ऊपर चढ़ता है ॥
उसका हाथ न कोई पकड़ता ।
स्वयं ही गिर फिर उठ चल पड़ता ।
उसका लक्ष्य थकाने वाला –
अतः वो रुक-रुक कर बढ़ता है ॥
अर्थहीन संवाद न करता ।
व्यर्थ वाद-प्रतिवाद न करता ।
अपनी गलती झुक स्वीकारे –
दोष न औरों पर मढ़ता है ॥
धरती पर ही स्वर्ग-नर्क हैं ।
उसपे इसके ढेर तर्क हैं ।
सारे नर्क मिटाकर अपने –
उन पर स्वर्ग नये गढ़ता है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, December 28, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 654 - दुर्गंधयुक्त स्वेद...........


दुर्गंधयुक्त स्वेद गुलाबों का इत्र था ॥
सच थूक भी उसको मेरा लगता पवित्र था ॥
दिखती थी उसको कालिमा भी मेरी रश्मिपुंज ,
जब वो कभी मेरा अभिन्न इष्ट मित्र था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, December 27, 2014

नवगीत (12) : उनको मैं असफल लगता हूँ ॥


उनको मैं असफल लगता हूँ ॥
गमले से जो खेत हुआ मैं ।
उनके ही तो हेत हुआ मैं ।
हूँ संवेदनशील औ भावुक –
पर उनको इक कल लगता हूँ ॥
जो बोले वो मैं कर बैठा ।
मरु में मीठा जल भर बैठा ।
व्योम निरंतर चूमूँ फिर भी –
उनको पृथ्वी तल लगता हूँ ॥
उनकी ही ले सीख हुआ हूँ ।
इमली से यदि ईख हुआ हूँ ।
मदिरा से कहीं अधिक मदिर पर
उनको सादा जल लगता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, December 26, 2014

नवगीत ( 11 ) : एक सिंहिनी हो चुकी जो भेड़ थी ॥


एक सिंहिनी हो चुकी जो भेड़ थी ॥
खुरदुरेपन में भी सच नवनीत थी ।
चीख में भी पहले मृदु संगीत थी ।
एक पाटल पुष्प की वह पंखुड़ी –
दूब कोमल अब कंटीला पेड़ थी ॥
तमतमा बैठी अचानक क्या हुआ ?
मैंने उसको बस लड़कपन सा छुआ !
कह गई अक्षम्य वह अपराध था –
जो ठिठोली, इक हँसी, टुक छेड़ थी ॥
मात्र जन थी अब नगर अध्यक्ष वो ।
वर्षों के उपरांत हुई प्रत्यक्ष वो ।
जब वो मिलकर चल पड़ी तो ये लगा –
भेंट थी वो या कोई मुटभेड़ थी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, December 25, 2014

नवगीत (10) : फिर गये जब घूर के दिन ॥


फिर गये जब घूर के दिन ॥
चापने उसको लगे सब ।
चाटने उसको लगे सब ।
पास में आने से जिसके –
कल तक आती थी जिन्हें घिन ॥
आँख का तारा हुआ है ।
सब का ही प्यारा हुआ है ।
जो न फूटी आँख भाया –
था किसी को एक भी छिन ॥
भाग्य फूटा जग गया है ।
जैकपॉट इक लग गया है ।
भीख न मिलती थी जिसको –
दान दे अब नोट गिन-गिन ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, December 23, 2014

नवगीत ( 9 ) : देख कहाँ पर आया तू ?


देख कहाँ पर आया तू ?
ओले ठण्ड के संवाहक ।
आग सदा ही हो दाहक ।
मैंने तो न कहीं देखी –
शीतल अग्नि बरफ  धू-धू ॥
देख कहाँ पर आया तू ?
ब्रह्मचर्य धारे नामी ।
सत्य-अहिंसा अनुगामी ।
गुपचुप यौनाचार में लिप्त –
खाते माँस गटकते लहू ॥
देख कहाँ पर आया तू ?
शोक-सभा में तू बतला ।
ऐसा भी होता है भला ?
संस्मरण-रोदन पश्चात –
हा-हा ,ही-ही ,हू-हू-हू ॥
देख कहाँ पर आया तू ?
मुझको भी दिखला वे घर ।
यदि सच है तो अभी चलकर ।
जिनमें हिल-मिल रहती हों –
माँ-बेटी सी सास-बहू ॥
देख कहाँ पर आया तू ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, December 22, 2014

नवगीत ( 8 ) : ऐसी मैं कविता लिखता हूँ ॥


ऐसी मैं कविता लिखता हूँ ॥
रोष में पर्वत को तिल कहता ,
हो सुरंग तो मैं बिल कहता ,
होता हूँ जब हर्षमग्न तो –
बूँद को भी सरिता लिखता हूँ ॥
कुछ मस्तिष्क को बूझ न पड़ता ,
बिन ऐनक जब सूझ न पड़ता ,
हृष्ट-पुष्ट सम्पूर्ण पुरुष को –
क्षीणकाय वनिता लिखता हूँ ॥
मित्र मंडली में जब फँसता ,
सुध-बुध भूल-भाल तब हँसता ,
कृष्ण धनी को रंक सुदामा –
राधा को ललिता लिखता हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, December 21, 2014

नवगीत (7) : सब चुप ! फिर मैं भी क्यों बोलूँ ?


सब चुप ! फिर मैं भी क्यों बोलूँ ?
सन्नाटे में बम फट जाये ।
गज़ भर की ज़बान कट जाये ।
कोई नहीं जब कुछ कहता है तो ,
मैं ही क्यों अपना मुँह खोलूँ ?
क्यों ऐसा चाहे जब घटता है ?
सोच रहे सभी ये सब क्या है ?
टहलते हुए सब खा पीकर ,
इक मैं ही भूखा इत-उत डोलूँ !
क्वाँरे क्यों बंजर जोत रहे ?
मुखड़ों पे डामल पोत रहे ?
पूछ रहा है पति पत्नी से ,
क्या मैं तेरी सखि के सँग सोलूँ ?
साथ समय के ये भागे है रे ।
बल्कि कहीं तो उससे आगे है रे ।
जैसा हुआ ये जग धावक है ,
मैं भी कहीं न वैसा हो लूँ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, December 15, 2014

156 : मुक्त-ग़ज़ल - ख़त हमसे तुमको यों तो......


ख़त हमसे तुमको यों तो लिक्खे गये तमाम ॥
लेकिन न डाकिया ना कभी मिल सका हमाम ॥
दिल क्या है जान भी ये लिख दी है तेरे नाम ,
दिखलाएंगे किसी दिन गर आएगा मक़ाम ॥
ताउम्र तेरे ख़त की लूँगा निहार राह ,
मत भेजना मगर तू इन्कार का पयाम ॥
मेरी दुकाँ के कुछ यूँ वो हैं ख़रीददार ,
ना मुफ़्त में ही लें कुछ ना देते पूरे दाम ॥
कहते हैं वो जो करते हैं हम ख़ुशी से फ़ौर ,
लेकिन न मान लेना उनके हैं हम ग़ुलाम ॥
आगोश में जो बैठे बाहों में ख़ूब सोए ,
मतलब निकल गया तो लेते नहीं सलाम ॥
भूले से पड़ गयी थी तुम पर नज़र क्या यार ,
अब तुमको देखने का है आख़री मराम ॥
तन्हाइयों में अक्सर लेकर तेरा ख़याल ,
करते हैं आप ही से हम आप ही क़लाम ॥
( हमाम=कबूतर ,मक़ाम=अवसर , फ़ौर=तुरंत , आख़री मराम=अंतिम इच्छा , क़लाम=बातचीत )
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, December 13, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 653 - पड़ा रहता है...........


पड़ा रहता है दलदल में न डूबा ना धँसा करता ॥
वो मकड़ी की तरह जालों में रहकर ना फँसा करता ॥
लतीफ़ागोई करके भी मेरी आँखें भर आती हैं ,
वो अपनी दास्ताने ग़म सुनाकर भी हँसा करता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, December 10, 2014

नवगीत ( 6 ) : अपना अहं घटा कर देखो.......


अपना अहं घटा कर देखो ॥
तुमको भी चहुंओर दिखेगा ,
विरल नहीं घनघोर दिखेगा ,
सूखा , पीला यदि आँखों से –
ऐनक हरा हटा कर देखो ॥
वह बच्चा मैला सारा है ,
पर अस्पृश्य नहीं प्यारा है ,
मात्र दृष्टि से घृणा हटा कर –
छाती से लिपटा कर देखो ॥
बीच राह में आते जाते ,
शक्तिहीन को क्या धमकाते ,
जो तुमसे बलवान शत्रु हो –
उसको धूल चटा कर देखो ॥
रावण को भी राम कहेगा ,
कंस को कृष्ण न श्याम कहेगा ,
वह मति मूढ़ नाम जप धुन में -
शुक को राम रटा कर देखो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, December 9, 2014

नवगीत ( 5 ) : मैं बारिश में गुड़ सा घुलता.....

मैं बारिश में गुड़ सा घुलता ॥
हर्षित तो किंचित रहता हूँ ,
प्रायः ही चिंतित रहता हूँ ,
जब देखो तब लेकर सिर पर –
अब मुझसे यह भार न ढुलता ॥
चिंतन कर-कर देख लिया सब ,
मुझको यही समझ आया अब ,
लाभ न इसका यद्यपि कुछ पर –
व्यर्थ नहीं मेरी व्याकुलता ॥
गंगा जल आसव निकला रे ,
देव मेरा दानव निकला रे ,
अब भी उस पर मरता मैं यदि –
मुझ पर उसका भेद न खुलता ॥
झूठ कहें सब मैं हूँ पागल ,
हार न जाऊँ घिस-घिस मल-मल ,
सच के साबुन सच के जल से –
यह कलंक झूठा न धुलता ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, December 8, 2014

नवगीत ( 4 ) : रह सतर्क देना वक्तव्य........

रह सतर्क देना वक्तव्य ॥
यदि निंदा भी करे तो सुन ,
ब्याज स्तुति के ढंग को चुन ,
शब्द प्राण हर सकते हैं ,
गाली भी बक जो हो श्रव्य ॥
हर रहस्य का पर्दा फाड़ ,
मुर्दा सड़ा-गला भी उखाड़ ,
यदि हो लाभ तो निःसन्देह –
अन्यथा चुप रहना ही भव्य ॥
कह ग़ज़लें या कहानी कह ,
बात पुरानी-धुरानी कह ,
किन्तु भूर्ज पत्रों को अब
कह चिकने कागज़ अति नव्य ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, December 7, 2014

नवगीत ( 3 ) : एक बार बतलाओ...........


डर किसका था तुमको ?
क्यों मुझसे पूछा न -
एक बार बतलाओ ?
तुम मुझपे मरते रहे ,
बिन पूछे करते रहे ,
चाँद को चकोरे सा
क्यों ये प्यार बतलाओ ?
सोची न युक्ति कभी ,
चाही न मुक्ति कभी ,
कैसे होता भाटा
प्रेम ज्वार बतलाओ ?
तुम यों ही देते रहे ,
बिन दाम हम लेते रहे ,
कैसे होगा चुकता
ये उधार बतलाओ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, December 5, 2014

नवगीत ( 2 ) : यद्यपि मैं ज्ञानी अपूर्व हूँ.........

यद्यपि मैं ज्ञानी अपूर्व हूँ ॥
वो समझें मैं वज्र मूर्ख हूँ ॥
मेरा बगुला-भगत से नाता ,
हर सियार मेरा लघु भ्राता ,
कथरी ओढ़ के पीता हूँ घी ,
एड़ा बनकर पेड़ा खाता ,
मैं जानूँ कितना मैं धूर्त हूँ  ?
चक्षु खुले हैं किन्तु सुप्त मैं ,
वो ये सोचें स्वप्नलुप्त मैं ,
मैं ही जानूँ कहाँ प्रकट हूँ ?
मैं ही जानूँ कहाँ गुप्त हूँ ?
मैं विचित्र अदृष्ट मूर्त हूँ ॥
लकवा पीड़ित वाम हस्त है ,
पग दायाँ पोलियो ग्रस्त है ,
आँख मोतियाबिंद समर्पित ,
बहरेपन से कर्ण त्रस्त है ,
अर्ध काय पर हृदय पूर्ण हूँ ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, December 4, 2014

नवगीत ( 1 ) खाता हूँ बस घास-फूस मैं


खाता हूँ बस घास-फूस मैं ॥
पहले खाने से
डरता था ।
बेमन से कम-कम
चरता था ।
पेट भरूँ अब ठूस-ठूस मैं ॥
कम पीता था
जब ज्यादा था ।
कारण वह पानी
सादा था ।
मिनरल पीता चूस-चूस मैं ॥
जब वह मेरे
पीछे लागे ।
मैं आगे वह
पीछे भागे ।
वह इक बिल्ली और मूस मैं ॥
उसके जैसा
मेरा भी झट ।
काम निपट जाता ,
जो फटाफट
दे देता उत्कोच-घूस मैं ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति