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Thursday, October 30, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 627 - हो जाए न सुन................


हो जाए न सुन चेहरा ज़र्द सुर्ख़-सब्ज़ भी ॥
थम जाए चलते-चलते यकायक न नब्ज़ भी ॥
मेरे तो सामने न इसका नाम लीजिए ,
मुझको है खौफ़नाक क़यामत का लफ़्ज़ भी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

अकविता : [ 3 ] हत्या













उन से ,
आप से ,
स्वयं से ,
सब से ,
एक ही
किन्तु
कदाचित
यक्ष प्रश्न :
क्यों
अपने अवश्यंभावी नश्वर शरीर की
अंतिम साँस तक
रक्षा करते रहने के लिए
हम करते ही रहते हैं
अजर , अमर , अविनाशी
अपनी ही
आत्मा की
बारंबार
नृशंस हत्या ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, October 29, 2014

अकविता : [ 2 ] जंगली


आज मैं जो भी हूँ
मेरे वह होने की वजह
तुम्हारे बारंबार पूछने पर भी
तुम्हें किस मुँह से कहूँ
कि सिर्फ तुम ही हो
मैंने कभी भी न चाहा था ऐसा बनना
मैं तो चाहता था तुम्हारे मुताबिक बनना
तुम जो कह देते मैं वह बनकर न दिखा देता तो तुम कहते
तब मेरा बुरा मानना नाजायज़ होता
किन्तु तुमने ही मुझे कुछ बनने को नहीं कहा
स्वीकारते रहे मैं जैसा भी था
यह तो बिलकुल भी नहीं रहा होगा कि
मेरा हर रूप तुम्हारे सपनों सा रहा हो
किन्तु चूँकि तुमने मुझे हर सूरत में हर हाल में
मुस्कुराकर ही स्वीकारने की क़सम ली थी
तुमने मुझे बहुत चाहा
बहुत प्यार किया
बहुत लाड़ किया
तुमने मुझे वन के पौधे की तरह
जैसा चाहे स्वच्छंद फैलने दिया
उपवन के गुलाब की तरह उसकी
अनावश्यक दिशाहीन छितराती बढ़ती लताओं की
काट-छांट नहीं की
वह विशाल रूप तो पा गया
किन्तु बेडौल हो गया
तो अब उसे तुम्हारे द्वारा
जंगली , जंगली चिढ़ाना  
क्या न्यायोचित है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

अकविता : [ 1 ] यूज़


यह सोचकर कि वह सुखी रहेंगे 
प्रयत्न करते हैं
बहुत बड़ा बल्कि सबसे बड़ा आदमी बनाने का
हम अपने बच्चों को
किन्तु
फिर
यह पक्का पता चल जाने पर भी
कि उन्हे सचमुच ही बड़ा नहीं बनना है
अथवा वे इसी हाल में बहुत खुश हैं
और
इन्हीं सीमित सुख सुविधाओं में भी
जीवन को पूर्ण आनंद से बिता लेंगे
हम क्यों उनमें
बड़ा बनने की तृष्णा कूट-कूट कर भरते है ?
वे
जबकि पूर्व से ही
स्वयमेव संतोष को सबसे बड़ा सुख
मानते हैं
हम क्यों उन्हें
सिखाते हैं –
‘ संतोष प्रगति का रोड़ा है ’ ?
कहीं सचमुच यही तो सच नहीं कि
जो हम अपने जीवन में न कर सके
अपने बच्चों से वह करवाकर
अपने दहकते असंतोष को बुझाना चाहते हों ?
आई मीन
अपनी अतृप्त कामनाओं अथवा
अधूरे सपनों की पूर्ति के लिए
कहीं हम
अपने बच्चों को
कर तो नहीं रहे
‘’यूज़’’ ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, October 27, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 626 - मेरे लिए वो ख़ुद को......


 मेरे लिए वो ख़ुद को तलबगार क्यों करे ?
नावों के होते तैर नदी पार क्यों करे ?
बिखरे हों इंतिख़ाब को जब फूल सामने ,
कोई भी हो पसंद भला ख़ार क्यों करे ?
[तलबगार=इच्छुक, इंतिख़ाब=चयन, ख़ार=काँटा]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 


Sunday, October 26, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 625 - मुझको बेशक़ न..........


मुझको बेशक़ न नज़र आता था मेरा साहिल ॥
चाँद , तारों सी बड़ी दूर थी मेरी मंज़िल ॥
लुत्फ़ आता था उन्हे पाने तैर चलने में,
जब तक उम्मीद थी लगता था ज़िंदगी में दिल ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, October 20, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 624 - किस रोज़ उसके वास्ते........


किस रोज़ उसके वास्ते मैंने न की दुआ ?
कब आस्ताना रब का न उसके लिए छुआ ?
वो बन गया जो चाहता था बनना वो मगर ,
पहले वो मेरा दोस्त था अब अजनबी हुआ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, October 19, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 623 - जाने किन ऊँचाइयों से......


जाने किन ऊँचाइयों से गिर पड़ा है ?
उठके भी ताले सा मुँह लटका खड़ा है ॥
और सब सामान्य है पर देखने में ,
पूर्ण जीवित भी वो लगता अधमड़ा है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 622 - कभी बन पाएँगे दोनों........


कभी बन पाएँगे दोनों न हमसफ़री न हमराही ॥
नहीं थोड़ा सा मुझमें और तुझमें फ़र्क है काफ़ी ॥
तेरे आगे मैं यूँ लगता कि जैसे ताड़ तू मैं तिल ,
है तू हिरनी तो मैं कछुआ, हूँ मैं बकरी तो तू हाथी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, October 18, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 621 - जितना तू चाहे..............


जितना तू चाहे सनम तक़्सीम कर ॥
चाहे ज़्यादा चाहे कम तक़्सीम कर ॥
बस मेरी बरदाश्त के मद्देनज़र ,
गर तुझे करना है ग़म तक़्सीम कर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, October 17, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 620 - बनाने वाला ही...........


बनाने वाला ही मुझको तबाह करता है !
मिटाके आह न भर वाह-वाह करता है !
है मुझपे पूरा हक़-ओ-अख़्तियार जब उसका ,
सही है फिर वो कहाँ कुछ गुनाह करता है ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, October 16, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 619 - ख़ाक में रख दूँ न मैं.............


ख़ाक में रख दूँ न मैं तेरी मिलाकर धाक-नाक ॥
बल्कि डरता हूँ न कर डालूँ मैं तुझको चाक-चाक ॥
सोचता हूँ जब करे तौहीन तू यारों के बीच ,
जब उड़ाता है मेरी बेताक़ती का तू मज़ाक ॥
[ ख़ाक=मिट्टी ,धाक=प्रसिद्धि ,नाक=सम्मान ,चाक-चाक=टुकड़े-टुकड़े ,बेताक़ती=शक्तिहीनता ]
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, October 15, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 618 - तुम जलाते हो तब भी.......


तुम जलाते हो तब भी तुमको जला कहना है !!
तुम गलाते हो फिर भी तुमको गला कहना है !!
जानता हूँ मैं तुम बुरे हो मगर चाहत में ,
मुझको ना चाहकर भी तुमको भला कहना है !!
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, October 14, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 617 - उसकी हसीन शक्ल...........


उसकी हसीन शक्ल 
दिल को लूट न जाती !
वो हाथ आते-आते 
छिटक-छूट न जाती !
बनते ही बनते मेरी 
ज़िंदगानी अर्श से ,
शीशे सी गिर ज़मीं पे 
टूट–फूट न जाती !
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, October 13, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 616 - न कोई अमीर-ऊमरा.........


न कोई अमीर-ऊमरा 
न मुफ़्लिसो-ग़रीब ॥
फटका न पास का 
न कोई दूर का क़रीब ॥
कोई भरे बज़ार भी 
मिला न ख़रीदार ,
बैठा जो मुफ़्त में भी 
अपना बेचने नसीब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Sunday, October 12, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 615 - छिप-छिपाकर भी..............


छिप-छिपाकर भी न 
खुल्ले तौर जारी है ॥
ख़त्म होने की जगह 
और-और जारी है ॥
जाने कब से और कब तक 
हाँ मगर सच्चों-
बेगुनाहों को सज़ा का 
दौर जारी है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, October 11, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 614 - जिस्मो-जुगराफिया...........



जिस्मो-जुगराफिया 
तुझसा नहीं जबर कोई ॥
तू है क्या चीज़ ये 
तुझको नहीं ख़बर कोई ॥
फिर दिखाई न देवे 
उसको कुछ सिवा तेरे ,
तुझको इक बार ही बस 
देख ले अगर कोई ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, October 10, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 613 - मोमी तो अश्क़................


मोमी तो अश्क़ दरिया से 
बहा गए थे सच ॥
पत्थर की आँखों में भी अब्र 
छा गए थे सच ॥
इतनी थी उसकी दर्दनाक 
दास्ताँ कि सुन ,
दुश्मन के भी कलेजे मुँह को 
आ गए थे सच ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, October 9, 2014

* मुक्त-मुक्तक : 612 - तुझको रक्खेगा मुझसा.........


तुझको रक्खेगा मुझसा 
शाद कौन बतला दे ?
तुझको पूछेगा मेरे 
बाद कौन बतला दे ?
जैसे करता है रब के 
वास्ते कोई बंदा ,
तुझको मुझसा करेगा 
याद कौन बतला दे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, October 8, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 611 - मेरे गले में झूम के.....


मेरे गले में झूम के 
लूमा ज़रूर था ॥
घण्टों वो मेरे साथ में 
घूमा ज़रूर था ॥
लब न लबों से अपने मेरे 
उसने थे छुए ,
लेकिन मुझे अकेले में 
चूमा ज़रूर था ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, October 7, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 610 - इक चिनगी एक..............


इक चिनगी एक सूखते 
जंगल की आग सा ॥
इक चींटी एक काले 
ख़तरनाक नाग सा ॥
दोनों में कुछ मुक़ाबला 
ठहराना गलत है ,
इक आफ़्ताब है तो इक 
फ़क़त चिराग सा ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, October 6, 2014

153 : ग़ज़ल - उसको मेरे वास्ते.......


उसको मेरे वास्ते 
पागल बना दो ॥
इश्क़ का मेरे उसे 
चस्का लगा दो ॥
मैं हमेशा से हमेशा 
को हूँ उसका ,
वो मेरा कब होगा 
कोई तो बता दो ?
कट मरूँगा सच वो मेरा 
गर हुआ ना ,
उसको ये ताकीद कर दो
ये जता दो ॥
मान ही बैठे हो जब तुम 
मुझको मुर्दा ,
दफ्न कर दो या हो मर्ज़ी 
तो जला दो ॥
जिस क़दर अय्यार हो तुम 
यार झटपट
तुम सा बन जाऊँ मैं कैसे ? 
मश्वरा दो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति

*मुक्त-मुक्तक : 609 - इक ज़रा लुत्फ़ो-मज़ा...........


इक ज़रा लुत्फ़ो-मज़ा 
जब हों न तारी ॥
हर तरफ़ तकलीफ़ो-ग़म हों 
भारी-भारी ॥
और यही आलम हो रहना 
उम्र भर तो ,
क्यों करूँ मैं ज़िंदगी की 
पासदारी ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, October 5, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 608 - याद के शोलों में.........


याद के शोलों में ख़ुद को 
फूँकता है आज भी ॥
तू नहीं फिर भी तुझे दिल 
ढूँढता है आज भी ॥
जाते-जाते वो तेरा 
मुझको बुलाना चीखकर ,
रात-दिन कानों में मेरे 
गूँजता है आज भी ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, October 4, 2014

*मुक्त-मुक्तक : 607 - कम से कम में भी ज़्यादा.......


कम से कम में भी ज़्यादा लुत्फ़ उठाकर निकले ॥ 
अपने चादर से कभी पाँव न बाहर निकले ॥ 
चाँद सूरज की तमन्नाएँ न पालीं हमने ,
जुगनुओं से बख़ूबी काम चलाकर निकले ॥ 
-डॉ. हीरालाल प्रजापति