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Sunday, August 3, 2014

मुक्तक : 594 - इक सिवा उसके कहीं........


इक सिवा उसके कहीं दिल 
आ नहीं सकता ॥
है ये पागलपन मगर अब 
जा नहीं सकता ॥
क्या करूँ मज्बूर हूँ अपनी तमन्ना से ?
फिर भी तो चाहूँ उसे जो 
पा नहीं सकता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, August 2, 2014

150 : ग़ज़ल - दोस्त कब सौ हज़ार.........


दोस्त कब सौ हज़ार करना है ?
इक दो बस ग़म गुसार करना है ॥
जिनसे नज़रें मिलाना हो मुश्किल ,
उनसे आँखों को चार करना है ॥
इस ज़माने में बस मोहब्बत के ,
और सब कुछ उधार करना है ॥
सब कहें प्यार और वो भी हम ,
अब तो हमको भी प्यार करना है ॥
ख़ुद को चाहे न हम सुधार सकें ,
दूसरों का सुधार करना है ॥
एक सुख का किनारा पाने को ,
कितने दुक्खों को पार करना है ॥
ज़िंदगी को चलाए रखने को ,
कोई तो रोज़गार करना है ॥
बाद मरने के भी रहें ज़िंदा ,
काम कुछ यादगार करना है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति