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Friday, July 25, 2014

148 : ग़ज़ल - उसका जीवन...........


उसका जीवन सुधर गया होता ॥
मरने से कुछ ठहर गया होता ॥
तैरना जानता तो बिन कश्ती _
और पर बिन भी तर गया होता ॥
मुझसे वो बोलते तो मुश्किल क्या ,
ग़ैर मुमकिन भी कर गया होता ॥
ज़िंदगी से न तंग होता तो ,
मौत से मैं भी डर गया होता ॥
मैं भी परदेश से दिवाली पर ,
काश ! होता तो घर गया होता ॥
पोल उसकी न खुल गई होती ,
क्यों वो दिल से उतर गया होता ?
तह में सूराख़ उस घड़े की था ,
वरना बारिश में भर गया होता ॥
ब्रह्मचारी था वरना वो तुझपे ,
तुझको तकते ही मर गया होता ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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