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Friday, June 13, 2014

135 : मुक्त-ग़ज़ल - यूँ ही सा देखने में है..............


यूँ ही सा देखने में है वो छोटा सा बड़ा इंसाँ ॥
सभी को बैठने कहता है ख़ुद रहकर खड़ा इंसाँ ॥
जहाँ सब लोग उखड़ जाते हैं पत्ते-डाल से , जड़ से ,
वो टस से मस नहीं होता पहाड़ों सा अड़ा इंसाँ ॥
वो अंदर से है मक्खन से मुलायम आज़मा लेना ,
यों दिखता है वो ऊपर नारियल जैसा कड़ा इंसाँ ॥
नहीं मिलता कहीं दो घूँट जब पानी मरुस्थल में ,
वहाँ ले आ पहुँचता है वो पानी का घड़ा इंसाँ ॥
जो सोता बेचकर घोड़े वो उठ जाता है बाँगों से ,
नहीं उठता है आँखें खोलकर लेटा , पड़ा इंसाँ ॥
यों जुड़ता है किसी से जैसे उसका ही वो टुकड़ा हो ,
क़रीने से अँगूठी में नगीने सा जड़ा इंसाँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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