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Thursday, April 10, 2014

131 : मुक्त-ग़ज़ल - कुछ को नटखट वो शरीर...........


कुछ को नटखट , शरीर और चुलबुली लगती II
कुछ को संजीदा वो ,सीधी भी औ भली लगती II
कुछ को लगती है सुपारी सी नारियल सी कभू ,
कुछ को गुलज़ार के कचनार की कली लगती II
उसका हर अंग जैसे नाप-तौल कर हो बना ,
अज सरापा वो किसी साँचे में ढली लगती II
वैसे औलाद है वो इक ग़रीब की लेकिन ,
कुछ अदाओं से अमीरों के घर पली लगती II
उसकी घुंघरू सी हँसी में हैं खनकें ज्यों कंगन ,
नर्म आवाज़ रेशमी औ मखमली लगती II
दोस्तों को तो हमेशा है वो पैग़ामे-अमन ,
दुश्मनों को सदा ही ख़बरे ख़लबली लगती II
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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