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Tuesday, March 4, 2014

121 : मुक्त-ग़ज़ल - रह गया है परिंदा तो................


रह गया है परिंदा तो अब नाम भर ॥
पर तो सय्याद ने सब दिये हैं कतर॥
खाद-पानी से महरूम बंजर ज़मीं ,
कैसे होगा कोई बीज याँ पे शजर ?
बस दरिंदों , फ़रिश्तों का रहवास है ,
आदमी के शहर में न बसते बशर ॥
कहते थकते न थे इश्क़ को हम ख़ुदा ,
कैसे बोलें इसी मुँह से अब हम क़हर ॥
प्यार दे मत ब- क़द्रे- ज़रूरत सही ,
क़ाबिले दाद हूँ थोड़ी इज्ज़त तो कर ॥
इश्तेहार अपने फ़न का भी होता अगर ,
हम भी होते तुम्हारी तरह नामवर ॥
दर से मेरे ग़रीबी उठी तो मगर ,
दीनो - ईमान रखकर के इक ताक पर ॥
जब थे बीमार कोई न आया कभी ,
हैं जनाज़े में शामिल कई डॉक्टर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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