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Sunday, February 9, 2014

116 : मुक्त-ग़ज़ल - जब किसी काम की ................


जब किसी काम की शुरुआत बिगड़ जाती है ॥
फिर तो जैसे हर एक बात बिगड़ जाती है ॥
जितना सोचें कि बच निकल लें खुरदुरेपन से,
अपनी चिकनाई उतना और रगड़ जाती है ॥
हाय तक़्दीर तरसते हैं जिसकी सुहबत को ,
हमसे अक्सर वो न मिलने को बिछड़ जाती है ॥
मेरी चादर है ये कि इक रुमाल है कोई ,
सिर को ढँकने लगूँ तो जाँघ उघड़ जाती है ॥
उसको जितना मैं सुलह के लिए मनाता हूँ ,
उतना वो नाज़नीं और-और झगड़ जाती है ॥
ज़िंदगी जैसे मेरी है लिबास मुफ़लिस का ,
लाख पैबंद लगाऊँ ये उधड़ जाती है ॥
मैं जो मंजिल की तरफ़ डग अगर बढ़ाऊँ दो ,
मुझसे ये चार कदम दूर को बढ़ जाती है ॥
काली करतूतों के खुलने के डर से नै ये तो ,
आदतन ही मेरी पेशानी सुकड़ जाती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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