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Saturday, August 31, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 324 - गुमनाम को शोहरत..............


गुमनाम को शोहरत का ख़ुदा आस्मान बख़्श ॥
फ़नकार हूँ नाचीज़ हूँ कुछ मुझको शान बख़्श ॥
मुफ़लिस हूँ नहीं चलती इस हुनर से ज़िंदगी ,
मेरी मुर्दा ज़िंदगी को न काँधा दे जान बख़्श ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, August 30, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 323 - मैं मुरीद वीरानों का..............


मैं मुरीद वीरानों का 
सचमुच अलबेला हूँ ॥
बाहर दिखता भीड़भाड़ हूँ 
झुण्ड हूँ मेला हूँ ॥
महफ़िल में शिरकत तो 
रस्मन करनी पड़ती है ,
अंदर तन्हा ,एकाकी धुर ,
निपट अकेला हूँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, August 29, 2013

103 : मुक्त-ग़ज़ल - हमसे न जाने हुईं..................


हमसे न जाने हुईं क्या गलतियाँ ॥
हर नतीजे पर गिरी हैं बिजलियाँ ॥
हमने नंगे भी निभाया फर्ज़ जब ,
पड़ रही थी कड़कड़ाती सर्दियाँ ॥
हमने घर अपना ही फूँका था मगर ,
हो गईं ख़ुद राख़ जलकर बस्तियाँ ॥
हमने की हैं कोशिशें जी-जान से ,
फिर भी तो हाथों लगीं नाकामियाँ ॥
शौक़ था पीने का लेकिन यों नहीं ,
मंदिरो-मस्जिद में ली हों चुसकियाँ ॥
मुफ़्त दुनिया ने किया रुस्वा हमें ,
कुछ नहीं था मेरे उनके दरमियाँ ॥
हम नहीं होते हैं पास उसमें मगर ,
ज़िंदगी ले इम्तिहाँ पर इम्तिहाँ ॥
जबकि हम बैठे नहीं चलते रहे ,
पर वहीं हैं आज तक कल थे जहाँ ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, August 28, 2013

102 : मुक्त-ग़ज़ल - ऐसा नहीं कि...............


ऐसा नहीं कि हमको आता नहीं लगाना ॥
पर चूक-चूक जाए  है आज ही निशाना ॥
नादां अगर न होते तो बद को बद न कहते ,
अब किस तरह मनाएँ नाराज़ है ज़माना ?
जब तक न की थी हमने हाँ वो मना रहे थे ,
तैयार देख हमको करने लगे बहाना ॥
इतनी दफा हम उनसे सच जैसा झूठ बोले ,
अंजाम आज का सब सच उसने झूठ माना ॥
इक बार आज़माइश हमने न की है उनकी ,
जब जब भी उनको परखा पाया वही पुराना ॥
महफ़िल में अपनी-अपनी कहने में सब लगे हैं ,
सुनने न कोई खाली कहने से क्या फ़साना ?
इस फ़िक्र में कि अपना क्या होगा ज़िंदगी में ,
हम भूल ही चुके हैं क्या हँसना क्या हँसाना ?
कहता  है हिज्र में ही रहता है प्यार ज़िंदा ,
महबूब आख़िरश न शादी को मुझसे माना ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, August 27, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 322 - जिसको थी तमन्ना................


जिसको थी तमन्ना मेरी 
उसको न मिल सका ॥
लेकिन मैं उसके दिल से 
उम्र भर न हिल सका ॥
मैं भी न हँस सका कभी 
रहकर के उससे दूर ,
वो भी न मेरे हिज्र में 
मुरझा के खिल सका ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, August 26, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 321 - कुछ बस अपने...................

कुछ बस अपने दीन तो कुछ ईमान बदलते हैं ॥
कुछ तो मालिक कुछ अपने भगवान बदलते हैं ॥
पल में लाल हरे पल भर में अपने मतलब को ,
अपना रँग गिरगिट जैसा इंसान बदलते हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, August 25, 2013

101 : मुक्त-ग़ज़ल - गर बुरा हूँ.............


गर बुरा हूँ मुझे बुरा कहिए ॥
नोन-मिर्ची लगा-लगा कहिए ॥
जो कहा था वो कर दिखाया है ,
मुझको वादे से मत फिरा कहिए ॥
अपनी तौहीन जो बर्दाश्त करूँ ,
मुझको बेशर्म बेहया कहिए ॥
उनको सर्दी की धूप खूब कहो ,
मुझको मत ओलों की बरखा कहिए ॥
किसको बरबादियों की तोहमत दूँ ,
अपने हाथों न पर मिटा कहिए ॥
अपने रोने को मैं छिपाता हूँ ,
क़हक़हों को छुपी अना कहिए ॥
ज़िंदगी जी रहा हूँ मैं जैसी ,
उसको बखुदा कड़ी सज़ा कहिए ॥
एक मुद्दत से नज़र बंद हूँ मैं ,
कोई पूछे तो मर गया कहिए ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, August 24, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 320 - बेबस बक़ैद आस्माँ...................


बेबस बक़ैद आस्माँ बेकस ज़मीं लगे ॥
औरत उदास ग़मज़दा सा आदमी लगे ॥
बदहाल है आलम तमाम मुल्क़ का यारों ,
अब ये निज़ाम तो बदलना लाज़मी लगे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, August 23, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 319 - वो कंकड़ी भी मारें............


वो कंकड़ी भी मारें सर उनके शिला रख दे ॥
इक बुर्ज़ भी छेड़ें तू बुनियाद हिला रख दे ॥
आधी सी भूल पर भी पूरा सबक दे उनको ,
मत बख़्श दुश्मनों को मिट्टी में मिला रख दे ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, August 22, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 318 - न परायों से न..................


न परायों से न अपनों से 
न ख़ुद से डरना ॥
जब भी इस राह पे पाँव 
अपने उठाकर धरना ॥
जब ख़ुदा ही है जब है रब तो 
डर के छुप के क्यों ,
इश्क़ बाक़ायदा 
कर कर के मुनादी करना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, August 21, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 317 - सच्चाई-हक़ीक़त..................


सच्चाई-हक़ीक़त से मुँह को 
फेर-मोड़कर ॥
हर फ़र्ज़-ज़िम्मेदारी से 
रिश्ते ही तोड़कर ॥
सालों से लाज़मी थी इक 
तवील नींद सो ,
आँखें ही मूँद लीं हरेक 
फ़िक्र छोडकर ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

रक्षाबंधन



रक्षाबंधन

सूरत के हिसाब से वह
चौदहवीं का चाँद नहीं बल्कि
प्रभात का हेमद्रावक सूर्य है
रंग उसका स्वर्णिम नहीं प्लेटिनमीय है
सर्वांग ढाँप रख सकने में समर्थ
ढीले ढाले अपारदर्शी वस्त्र धारण रखने के बावजूद भी
जिसकी देहयष्टि के आगे पानी भर रही हों
ज़ीरो फ़िगर वाली तमाम फ़िल्मी सेक्स-सिंबल हीरोइने
जिन्हे देखकर आदमी खोने लगता है
हनीमून के ख्वाबों में
और तुम मुझसे कह रहे हो
क्योंकि उसका कोई भाई नहीं है
क्योंकि मेरी कोई बहन नहीं है
बन जाऊँ उसका भाई
नहीं मित्र ! कदापि नहीं !
कह दो उसे
रक्षाबंधन के दिन
बिना राखी के भी मेरी सूनी कलाई
सुंदर लगती है ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, August 20, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 316 - बर्फ़ानी काली-रात...............


बर्फ़ानी काली-रात 
दुपहरी का आफ़्ताब ॥
घनघोर अमावस में 
ऊग जाये माहताब ॥
दीवाने का हर्फ़-हर्फ़ 
लफ़्ज़-लफ़्ज़ सही हो ,
चेहरे से इक ज़रा सा तू 
उठा दे गर नक़ाब ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 315 - नहीं लिखता है तू...............


नहीं लिखता है तू इक बार लिख मेरी मगर लिखना ॥
ख़ुदा मेरे मेरी तक़दीर दोबारा अगर लिखना ॥
कि जितनी चाय में शक्कर कि आटे में नमक जितना ,
तू बस उतना ही उसमें रंजो-ग़म कम या ज़बर लिखना ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति  

Monday, August 19, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 314 - जाता नहीं मैं...............


जाता नहीं मैं भूलकर भी 
अब तो वहाँ पे ॥
आती है तेरी बेपनाह 
याद जहाँ पे ॥
वीरान दिल को कैसे फिर 
आबाद करूँ मैं ?
फिर से बसाऊँ बस्ती 
मोहब्बत की कहाँ पे ?
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Sunday, August 18, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 313 - उनके मुख को मुख................


उनके मुख को मुख नहीं बस 
लिखते रहे कंवल ॥
सिर्फ़ ख़्वाब बुनते रहे बस
 कहते रहे ग़ज़ल ॥
लेने वाला ले उड़ा जब 
उनको पैदल चल ,
हाथ हिलाते रह गये हम बस 
दिल मसल-मसल ॥
 -डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 312 - जिससे ऊबा हूँ............



जिससे ऊबा हूँ रोज़-रोज़ मशक़ में आया ॥
जिसको चखते ही उल्टियाँ हों हलक़ में आया ॥
कैसे बोलूँ ये दस्तयाबी क़ामयाबी है ?
जिससे बचता था दूर रहता था हक़ में आया ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Saturday, August 17, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 311 - आँखों के बाद भी..............


आँखों के बाद भी रहे 
मंजर से दूर हम ॥
अल्लाह-ख़ुदा-रब-वली-
ईश्वर से दूर हम ॥
किस बात का  था ग़ुस्सा कि 
हम मुँह  बिसूर के ,
होटल में रहे ग़ैर के निज 
घर से दूर हम ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Friday, August 16, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 310 - मेरे जितने हमसफर.............


मेरे जितने हमसफ़र थे तयशुदा मंजिल पे हैं ॥
मैं तलातुम में हूँ बाक़ी ख़ुशनुमा साहिल पे हैं ॥
मैं भी उतना ही था मेहनतकश औ’’ ताक़तवर मगर ,
मैं पड़ा पाताल सारे माह-ए-क़ामिल पे हैं ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Thursday, August 15, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 309 - मुफ़लिसी में अपार................


मुफ़लिसी में अपार 
दौलतो-दफ़ीना हो ॥
बाढ़ से जो लगा दे 
पार वो सफ़ीना हो ॥
धुप्प अँधेरों में इक 
मशालची हो,सूरज हो,
कब से इस बंद दिल का 
तुम धड़कता सीना हो ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

जिस तरह से.................


जिस तरह से पूजो देवी-देवता , 
ठीक यों उनको भी आदृत कीजिये ॥
गीत गाओ रात-दिन स्वातंत्र्य के ,
पर शहीदों को न विस्मृत कीजिये ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

कर गये जो मृत्यु की............


कर गये जो मृत्यु की गोदी में चिरकालिक शयन ॥
जंगे आज़ादी में जो काम आ गये उनको नमन ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Wednesday, August 14, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 308 - तक़दीर उड़ाना चाहे..............


तक़दीर उड़ाना चाहे गर मज़ाक़ दोस्तों ॥
सोना भी हो जाता है पल में ख़ाक दोस्तों ॥
सूरज जला न पाये जिसकी ज़ुल्फ़ उसी की ,
हो जाएँ हड्डियाँ बरफ़ से राख़ दोस्तों ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

*मुक्त-मुक्तक : 307 - उसको नुकसां नहीं................


उसको नुकसां नहीं है 
सिर्फ़ नफ़ा है मुझसे ॥
इतने सालों में मगर 
पहली दफ़ा है मुझसे ॥
देखके मुझको ख़ुश औ’’ 
सिर्फ़ ख़ुश होने वाला ,
मुझको हैरत है आज 
सख़्त ख़फ़ा है मुझसे ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Tuesday, August 13, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 306 - मुझे बर्बाद करने............


मुझे बर्बाद करने में 
न तुम कोई कसर रखना ॥
अगर बच जाऊँ खाने में 
मिलाकर के ज़हर रखना ॥
अगर मिलती हैं इससे ही 
तुम्हें खुशियाँ तो हाज़िर हूँ ,
मगर मर जाऊँ तो मैयत पे 
दो गुल , दो अगर रखना ॥
-डॉ. हीरालाल प्रजापति 

Monday, August 12, 2013

*मुक्त-मुक्तक : 305 - भावों के मौन.............


भावों के मौन स्पष्ट प्रहारों से दे जवाब ॥
माना ज़ुबाँ नहीं तो इशारों से दे जवाब ।
कब तक सहन करेगा बदसलूकियाँ उसकी ,
अब सब्र छोड़ गोली-कटारों से दे जवाब ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति