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Monday, November 11, 2013

109 : मुक्त-ग़ज़ल - इतनी आबादी न थी........................


इतनी आबादी न थी तब आदमी था क़ीमती ॥
अब तो बकरे से भी सस्ती आदमी की ज़िंदगी ॥
पालना मुश्किल है इक औलाद का महँगाई में ,
फ़िर भी बच्चों पर भी बच्चे जन रहा है आदमी ॥
इक तरफ़ पंखे भी कूलर भी तबेले में लगे ,
और घर में फुंक रहा है गर्मियों में आदमी ॥
जैसे बस हो इक अनार और सैकड़ों बीमार हों ,
आजकल इक चीज़ ऐसी हो गई है नौकरी ॥
पहले महमाँ देखकर कहते थे घर आया ख़ुदा ,
अब तो मेहमानों से नफ़रत आदमी को हो रही ॥
यूँ तो हैं पहचान के कई सैकड़ों इस शहर में ,
पर मुझे अपना नहीं सचमुच लगा एकाध भी ॥

-डॉ. हीरालाल प्रजापति 
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